ब्राह्मणी व्यवस्था के मानसिक गुलाम होने से ही पुरुष अपनी महिलाओं को गुलाम रखते हैं
राष्ट्रीय मूलनिवासी महिला संघ के तीसरे राष्ट्रीय अधिवेशन के उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता करते हुए मा. वामन मेश्राम साहब ने पुणे में महिलाओं की आज़ादी, संघर्ष और ब्राह्मणी व्यवस्था पर ऐतिहासिक वक्तव्य दिया।
🔴 गुलामी को समझे बिना आज़ादी संभव नहीं
मेश्राम साहब ने कहा कि आज़ादी की लड़ाई गुलामी को समझने से शुरू होती है। जिस समाज को अपनी गुलामी का इतिहास मालूम नहीं, वह कभी आज़ाद नहीं हो सकता।
🟢 मातृप्रधान व्यवस्था का ऐतिहासिक सच
भारत में एक समय मातृप्रधान व्यवस्था थी, जहाँ महिलाएँ केवल परिवार की नहीं बल्कि राष्ट्र की मुखिया हुआ करती थीं।
आज भी नागालैंड, मिज़ोरम की ख़ासी जनजाति में यह परंपरा जीवित है, जहाँ विवाह के बाद पुरुष पत्नी के घर जाता है।
⚠️ ब्राह्मणी व्यवस्था और पितृसत्ता का आरोपण
मेश्राम साहब ने स्पष्ट किया कि यूरेशियन ब्राह्मणों ने भारत में पितृप्रधान व्यवस्था थोपी और मातृप्रधान समाज को समाप्त किया।
इसी प्रक्रिया में जाति व्यवस्था, अस्पृश्यता, असमानता और स्त्री दासता को जन्म दिया गया।
🔥 सती प्रथा, कन्यादान और बाल विवाह
सती प्रथा, विधवा विवाह निषेध, बाल विवाह और कन्यादान महिलाओं को गुलाम बनाने के औज़ार थे।
🧠 पुरुष नहीं, व्यवस्था दुश्मन है
महिलाएँ पुरुषों की नहीं, बल्कि ब्राह्मणी व्यवस्था की पहली गुलाम हैं।
पुरुषों को इस व्यवस्था का वाहक बना दिया गया है, इसलिए लड़ाई पुरुषों से नहीं बल्कि व्यवस्था से होनी चाहिए।
✊ महिला मुक्ति की तीन लड़ाइयाँ
- बौद्धिक संघर्ष – समस्या को समझना
- संगठित संघर्ष – संगठन निर्माण
- जन आंदोलन – करोड़ों महिलाओं की भागीदारी
📌 BAMCEF का 5-पॉइंट महिला कार्यक्रम
- जागरण
- प्रशिक्षण
- प्रोत्साहन
- प्रतिनिधित्व
- नेतृत्व
🌍 महिलाओं की आज़ादी से ही भारत की आज़ादी
महिलाओं को आज़ाद किए बिना पुरुष भी आज़ाद नहीं हो सकते।
इसलिए महिलाओं को सामाजिक और राष्ट्रीय कार्यों में आगे लाना ही वास्तविक मुक्ति का मार्ग है।
बा ने कहा है!
"हड्डियों की कमजोरी या घुटनों में घिसावट की दिक्कत? बबूल की फली का चूर्ण थोड़ा शहद में मिलाकर रोज़ सुबह-शाम 1 चम्मच लो। एक हफ्ते में हड्डियों को मजबूती, घुटनों में चिकनाई और टूटे हिस्सों को जुड़ने में मदद मिलती है।" !"ब्राह्मणी व्यवस्था के मानसिक गुलाम होने से ही पुरुष अपनी महिलाओं को गुलाम रखते है। मा. वामन मेश्राम (राष्ट्रीय अध्यक्ष, बामसेफ) ३ रा राष्ट्रीय मूलनिवासी महिला संघ के अधिवेशन में उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता करते हुए मेश्राम साहेब ने बताया की, आज राष्ट्रीय मूलनिवासी महिला संघ का ३रा राष्ट्रीय अधिवेशन पूना शहर में हो रहा है। और ये जो राष्ट्रीय अधिवेशन हो रहा है। इस अधिवेशन के उद्घाटन सत्र में जो विषय चर्चा करने के लिए रखा गया है। वो विषय है "आजादी मुफ्त में नहीं मिलती है इसलिए महिलाओं को अपने हिस्से की लड़ाई खुद लड़नी चाहिए एक चुनौती पूर्ण बहस" ये विषय चर्चा करने के लिए रखा गया है। इस विषय पर राष्ट्रीय अधिवेशन के मौके पर कुछ बाते समझाया जाना बहुत जरूरी है। सबसे पहली बात तो ये है कि यदि महिलाओं को आजादी हालिस करनी है तो आजादी हासिल करने की जो लड़ाई है। वो गुलामी जानने से आजादी हासिल करने का मार्ग शुरू होता है। सबसे पहले आजादी हासिल करने की धारणा रखने वाले जो लोग है। तो सबसे पहले उनको गुलाम बनाये जाने का इतिहास मालूम नहीं है। तो गुलामी के विरोध में आजादी हालिस करने का जो संघर्ष है वो संघर्ष शुरू ही नहीं हो सकता तो इसीलिए सबसे पहले इस देश में महिलाओं को गुलामी का इतिहास है वो बहुत लंबा इतिहास है मगर मैं संक्षिप्त में आप लोगों को समझाना चाहता हूँ। सबसे पहले भारत में महिलाओं की जो प्रधान व्यवस्था थी उसके बारे में आज की जो भी पढ़ी लिखी महिलायें है उनके पास जानकारी नहीं है। वे इस देश में मातृप्रधान व्यवस्था हुआ करती थी मेरे सामने हमेशा मातृप्रधान व्यवस्था समझाने के लिए हमेशा ये समझा रही है कि महिलाओं को मातृप्रधान व्यवस्था में कैसे समझाया जाए मैं हमेशा महिलाओं को इस बात को समझाने के लिए कहता हूँ कि आज के तारीख में महिलायें शादी होने के बाद जिस पती के साथ उसकी शादी होनी है। उसके घर में उस पत्नी को अपने माँ-बाप का घर छोड़कर जाना पड़ता है। मगर मातृप्रधान व्यवस्था में पुरूषों को आज की महिलाओं की तरह अपना घर छोड़ के पत्नी के घर जाना पड़ता है। ये बात इसलिए मैं समझा रहा हूँ आज भी ये परंपरा प्रथा, नागालैण्ड, मिजोरम के एरिया में खाँसी नाम की जो ट्राईब है वो आज भी है। जैसे महाराष्ट्र में भिल्ल, गोंड, प्रधान है उसी तरह से खाँसी एक ट्राईब है। आदिवासी है और वहाँ पर आज भी आज के तारीख में भी शादी होने के बाद पुरुष को अपने पत्नी के यहाँ अपने माँ-बाप के घर को छोड़कर जाना पड़ता है। आज भी ये परंपरा को उन्होंनें जीवित रखा है। अपने एरिया में व्यवस्था ये बात इसीलिए मैं आप लोगों को बता रहा हूँ कि आपको ये जो सारी व्यवस्था को उल्टा कर दिया गया उसका कारण मातृप्रधान व्यवस्था है। मातृप्रधान व्यवस्था में महिलायें केवल परिवार की ही मुखिया नहीं हुआ करती थी वो राष्ट्र की भी मुखिया हुआ करती थी। राष्ट्रप्रमुख हुआ करती थी और राष्ट्र को चलाने का काम किया करती थी ये मातृप्रधान व्यवस्था जो यूरेशियन ब्राह्मण भारत में आये उन लोगों ने क्योंकि उनकी जो यूरोपियन और अमेरिकन सिस्टम है अंग्रेजों का सिस्टम है ये पितृप्रधान व्यवस्था है। और ये पितृप्रधान व्यवस्था होने की वजह से जब वो यहाँ आये तो उन्होंने अपनी पितृप्रधान व्यवस्था यहाँ पर लागू की और पितृप्रधान व्यवस्था लागू करने के पीछे क्योंकि उनके साथ तो महिलाएं भी नहीं थी तो उन्होंने पितृप्रधान अपनी संस्कृती यहाँ के मूलनिवासी लोगों पर थोप दी और मातृप्रधान व्यवस्था को समाप्त किया। S PO डीएनए के अनुसार जो शोध हुआ मेडिकल साइंस और बायोला. जिकल के आधार पर प्रमाणित हुआ है। सारे दुनिया के सुप्रीम कोर्ट में डीएनए को प्रमाणित माना जा रहा है। तो इसीलिए ये अब सर्वाधिक रिसर्च की हुई प्रमाणित बात है। और उसको सत्य माना जाता है। आधार माना जाता है। इसको हम भी आधार मानकर विचार करते है तो इसीलिए इस तरह का परिवर्तन उसमें किया जाना जरूरी है। तो उन्होंने पितृप्रधान व्यवस्था को यहाँ लागू करने के पीछे यहाँ की मातृव्यवस्था को गुलाम करना यह कारण है क्योंकि वो सिर्फ परिवार नहीं चलाती बल्कि देश चलाती थी। इसीलिए ब्राह्मणों ने मर्मा. हलाओं को आधार बनाकर जाति व्यवस्था निर्माण किया और जातिव्यवस्था का विकास किया और महिलाओं को आधार बनाया इसके प्रमाण उपलब्ध है। जैसे महिलाओं को आधार बनाने का एक प्रमाण है कि दुनिया में केवल हमारे ही यहाँ सती प्रथा है और सती प्रथा महिलाओं को आधार बनाकर बनाई गई। महिलाओं के ही विधवा विवाह पर पाबंदी लगाई गयी, बाल विवाह का प्रचलन महीलाओं के साथ जोड़ा है। और महिलाओं के साथ जुड़ी बहुत सारी और परंपरागत बाते हैं भारतीय ब्राह्मणों की विवाह संस्था में कन्यादान का प्रचलन है। जो दुनिया में कही पर भी नहीं है केवल मात्र भारत में है। कन्या एक स्त्री है स्त्री होने के वजह से एक जीव है और जीव किसी की भी संपत्ती नहीं होती तो किसी जीव को आप दान नहीं दे सकते मगर ब्राह्मणों के धर्मशास्त्र में स्त्री को विवाह में दान देने का कन्यादान का प्रचलन जो है वो इसीलिए प्रचलन में लाया गया था। क्योंकि यूरेशिन ब्राह्मण पुरूष भारत में आये हुये थे तो उन लोगों के सामने अपनी प्रजा को भारत में बढ़ाने के लिए उनके पास स्त्री नहीं थी। प्रजनन के लिए स्त्री की जरूरत होती है। और भारतीय समाज उनको स्त्री देने के लिए राजी नहीं था और इस वजह से बहुत ज्यादा संघर्ष होता था। आप लोगों ने महाभारत की कथा में पढ़ा होग कि उसमें एक द्रौपदी की कथा आती है और सारा महाभारत द्रौपदी के आगे-पीछे घुमता रहता है। और सारा रामायण सीता को आधार मान कर खड़ा हुआ हैं ये जो सीता है और महाभारत की द्रौपदी है ये दोनों महिलायें भारत की मूलनिवासी है। और उनके जो पति है वो विदेशी है। क्योंकि रामायण में जो राम है वो राजा तो है लेकिन क्षत्रिय नहीं है। क्योंकि वो दशरथ का बायोलोजिकल पुत्र नहीं है। रामायण में ऐसा लिखा हुआ है कि दशरथ निपुत्रीक थे इसलिए ब्राह्मणों के द्वारा जो व्यवस्था ब्राह्मण शास्त्रों में बनाई गई है उसके अनुसार ब्राह्मणों के द्वारा दशरथ ने पुत्र प्राप्त करवाया है। ऐसा रामायण लिखने वाले ब्राह्मणों ने रामायण में लिखा हुआ है। तो ब्राह्मणों का कहना है कि राम दशरथ का बायोलोजिकल पुत्र नहीं है। वो ब्राह्मणों के द्वारा उत्पन्न किये हुये थे इसे साफ है कि राम राजा तो थे मगर क्षत्रिय नहीं थे। ब्राह्मण थे। और महाभारत में आर्यपुत्र, आर्यपुत्र आर्यपुत्र ऐसा बार-बार जिक्र हो रहा है। याने पाण्डव भी आर्य पुत्र और कौरव आर्य पुत्र, नायक भी आर्य पुत्र और खलनायक भी आर्य पुत्र तो वहाँ महाभारत में आपने देखा होगा कि ये जो महिलायें रामायण और महाभारत में है वो मूलनिवासी है। तो आज डीएनए के अनुसार जो शोध लगा उन शोधों के अनुसार ब्राह्मणों ने महिलाओं का जातिव्यवस्था निर्माण करने के लिए उपयोग किया और ये उपयोग करने के जो बंधन है वो बंधन स्त्रीयों पर डाले जिसका प्रमाण सती प्रथा में बाल विवाह में और महिलाओं के मुंडन करने में कन्यादान में और वट सावित्री जैसी प्रथा से जुड़ा हुआ है। इसे ये बात प्रमाणित होती है कि भारत में खास तौर पर साउथ इस्ट एरिया में ये जाति व्यवस्था का प्रचलन है। इस साउथ ईस्ट एशिया में में ब्राह्मण व्यवस्था हावी है। और साउथ ईस्ट एशिया में प्रधान जो मुख्य देश का वो भारत है। याने इन लोगों ने मातृप्रधान व्यवस्था को समाप्त किया और पुरूष प्रधान सिस्टम को लागू किया और हमारे ऊपर थोपा उसका विकास किया इस ब्राह्मणवादी व्यवस्था में अस्पृश्यता, भेदभाव, गैरबराबरी, असमानता, ऊच-नीच, वर्गव्यवस्था, जातिव्यवस्था, आदिवासियों का अलगीकरण और स्त्री दारयता की गुलामी यहाँ एससी, एसटी, ओबीसी और मायनोरिटी लोगों पर थोपी गई अगर ये बात Historical (ऐतिहासकि) आधार पर सही है तो हमें ये बात समझनी होगी कि इस देश में महिलाएं ब्राह्मणवादी व्यवस्था की गुलाम है। महिलाएं पुरुषों की गुलाम है। ये सही नहीं है। स्त्री और पुरुष के संबंध में जो भेदभाव है वो सारी दुनिया में है। और इस भेदभाव के आधार पर जो लिंग भेदभाव मामला है, तो महिलाओं को लिंग भेदभाव के द्वारा जो भेदभाव सहन करना पड़ता है। वो सारी दुनिया में है मगर जो सारी दुनिया में है वो भारत में नहीं है। क्योंकि सारी दुनिया में वर्णव्यवस्था और जाति व्यवस्था नहीं है। अस्पृश्यता नहीं है। आदिवासियों का अलगीकरण नहीं है और महिलाओं की दासता नहीं है ये वहां नहीं है। ये जो खास ब्राह्मण व्यवस्था है ये ब्राह्मणी व्यवस्था यहाँ पर थोपी गई है और धोप ने के वजह से स्त्री और पुरुष दोनों गुलाम बना दे गये है। उन्होंने हमारे समाज में भी लागू कर दी है। तो हमारी समाज की महिलाओं को गुलाम बनाने के काम में उन्होंने हमारे अपने पुरूषों को लगा दिया। तो इसका मतलब ये है। हमारे अपने समाज के जो पुरूष है। जो पुरूष होने के वजह से महिलाओं को गुलाम नहीं बनाते रहे बल्कि वे ब्राह्मणवादी व्यवस्था के वाहक बनकर चालक बनकर वो उस व्यवस्था को अपने परिवार पर लागू करते है। मगर वो गुलामी ब्राह्मणवादी गुलामी पुरूष प्रधान संस्कृती में महिलाएँ अपने परिवार में परिवार का मुखिया पुरूष है। इस वजह से गुलाम बनाई गयी है। मगर वो गुलामी ब्राह्मणवादी गुलामी पुरुष अपनी परिवार में लागू करता है। तो महिलाएँ ब्राह्मणवादी व्यवस्था की गुलाम है। पुरूष की गुलाम नहीं है। पुरूष को इस काम के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। और इस्तेमाल करने के लिए स्त्री और पुरूष दोनों को शिक्षा के अधिकार से वंचित कर दिया गया इस वजह से उनके बुद्धि का विकास नहीं हुआ विवेक बुद्धि का विकास ना होने का मतलब गलत को गलत जानना और सही को सही जानना इसकी योग्यता विकास होने ना देना। ये विवेक बुद्धि का विकास ना होने के लक्षण है। और विवेक बुद्धि विकसित क्यूँ नहीं हुई क्योंकि हमारी बुद्धि विकसित नहीं हुई हमारी बुद्धि विकसित क्यूँ नहीं हुई क्योंकि हमारे पढ़ने-लिखने पर पांबदी लगादी गयी इस वजह से गलत और सही का जजमेंट बनाने की क्षमता समाप्त हुई। इस वजह से वो पुरूष ब्राह्मणवादी व्यवस्था को अपने परिवार में लागू करता है। और जब दीर्घ काल तक वो लागू करता है। तो गुलामी उसके व्यवस्था का हिस्सा बन जाती है। और बन गयी। वो पुरूष भी यही कर रहा है। महिला भी यही कर रही है। ये महिलाओं का अधिवेशन है। इसीलिए मैं आपको एक बात बताना चाहता कि महिलाएँ अपने घर में अगर एक लड़की और एक लड़का है तो महिला क्या सोचती है कि वो अपनी लड़की को कहती है कि तेरे हूँ। को पढ़-लिखकर क्या करने का तेरे को तो खाना ही बनाने का काम करना है। तुझे ज्यादा पढ़-लिखने की जरूरत नहीं है। तो एक महिला अपने परिवार में अपने ही लड़की के साथ ऐसा व्यवहार करती है। अब वो लड़की भी बड़ी हो जाती है। स्त्री बनेगी तो वो भी ऐसा भेदभाव करेंगी और अपने बेटे को बढ़ायेगी। तो ये गुलामी दीर्घजीवी हो गई, दिमाग में बैठ गई और इतनी बैठ गई कि गुलामी उनको गुलामी नहीं लगती। बहुत सारे करोड़ों लोग गुलामी को मौज सहते है। और इसीलिए उनको प्रता ही नहीं चलता इतना भयंकर परिणाम दीर्घजीवी गुलामी होने के वजह से हुआ तो मैं आप लोगों को जो महत्वपूर्ण बात बताना चाहता हूँ कि स्त्री सारी दुनिया में पुरूषों को गुलाम होगी। मात्र भारत में पुरूषों की गुलाम नहीं है। वो ब्राह्मणवादी व्यवस्था की प्रथम गुलाम है। उसके बाद वो पुरूषों की गुलाम है। अगर वो ब्राह्मणवादी व्यवस्था की प्रथम गुलाम है तो पहले ब्राह्मणवादी व्यवस्था को खत्म करने के लिए उससे संघर्ष करना होगा तो आजादी का रास्ता मिलेगा आजादी कैसी मिलेगी? तो समझना होगा इस लड़ाई की रणनीति को तो किसके खिलाफ में लड़ाई लड़नी होगी पुरूष के खिलाफ लड़ाई लड़नी होगी तो आपके घर में ही लड़ाई शुरू हो जायेगी। अगर आप आजाद होना चाहते हो व्यवस्था में जिन्होंने गुलाम बनाया तो उस ब्राह्मणवादी व्यवस्था के विरोध में लड़ई लड़नी होगी। अगर ब्राह्मणवाद व्यवस्था के विरोध में लड़ाई लड़नी होगी पहीले इस बात बात को समझना होगा के खिलाफ और हमें पुरूष के नहीं ब्राह्मणवादी व्यवस्था के विरोध में लड़ाई लड़नी होगी। और ब्राह्मणवादी व्यवस्था के विरोध में यदि मःि हलाओं को लड़ना है तो लड़ने के लिए यहाँ पुरूष भी आपलोगों का साथ देंगे। क्योंकि महिलाओं को आजाद करने का क्या मतलब है। इस बात को भी जागना होगा भी महिलाओं को आजाद करने का क्या अर्थ है? तो इसका मतलब है कि संघर्ष करने के लिए महिलाओं को तैयार करना ये ब्राह्मणवादी व्यवस्था के विरोध में लड़ना होगा। इस बात को समझना होगा और समझने के लिए महिलाओं को सामाजिक और राष्ट्रीय कार्य करने के लिए क्योंकि अभी जो पुरूष मानसिक रूप से ब्राह्मणवादी व्यवस्था का गुलाम है। वो पुरूष अपने महिलाओं से केवल खाना पकाने का कार्य करवाता है। अगर वो अनपढ़ है तो खाना पकाने का कार्य करवाता है। अगर वो ग्रेजुएट है को खाना पकाने के लिए कार्य करवाता है अगर वो पोस्ट ग्रेजुएट है तो भी खाना पकाने का कार्य करवाता है। तो खाना पकाने के लिए ग्रेजुएट होने की क्या जरूरत है। खाना पकाने के लिए पोस्ट ग्रेजुएट होने की इंजीनियर, डाक्टर, वकील होने की क्या जरूरत है? तो वो पढ़ी-लिखी जो महिलाएं है उन महिलाओं से भी वो खाना पकाने का काम करवाते हैं। महिलाओं से खाना पकाने का काम करने के बजाय महिलाओं से सामाजिक और राष्ट्रीय कार्य करवाया जाना चाहिए यदि पुरूष महिलाओं से सामाजिक और राष्ट्रीय कार्य करवाते है तो पुरूष महिलाओं को आजाद कर रहे है। ऐसा माना जायेगा अगर वो केवल महिलाओं का उपयोग खाना पकाने के लिए और प्रजनन करने के लिए ही करना चाहते है तो ये तो कुत्ते भी करते है। ये कौन सा बड़ा काम है। यदि महिलाओं को आजाद करना है तो उनको सामाजिक कार्य और राष्ट्रीय कार्य करने के लिए तैयार करना होगा आजाद करना होगा। सामाजिक कार्य करने का मतलब है। समाज को बदलने का कार्य करने का, परिवार से बाहर है समाज, समाज परिवार से बड़ मामला है तो वो परिवार से बाहर जाकर ही करना होगा। राष्ट्र कार्य का मतलब है देश को चलाने वाली संस्थाओं पर काबिज होना और उन संस्थाओं को देश हित में चलाना राष्ट्रीय कार्य है ये कार्य करने के लिए यदि पुरूष लोग महिलाओं को कार्य करने के लिए प्रोत्साहित करते हो तो माना -जायेगा पुरूष अपनी महिलाओं को आजाद कर रहे है। और जब महिलाओं को आप आजाद करोगे तो महिलाओं को संघर्ष करना होगा तो संघर्ष करने का क्या मतलब है। संघर्ष करने का मतलब के बौद्धिक संघर्ष करना बौद्धिक संघर्ष करने का मतलब की हमारी समस्या क्या है। ये जानना बौद्धिक काम है। और वो समस्याएँ क्यू है। उस समस्याओं का समाधान कैसे होगा वो समाधान करने के लिए मुझे व्यक्तिगत क्या करना होगा। ये सारा समझना बौद्धिक कार्य है और इसके लिए आपको आपने से ही जुझना होगा मेहनत करनी होगी संघर्ष करना होगा और बातों को जानना होगा समझना होगा और दूसरा संघर्ष है संगठित संघर्ष संगठित संघर्ष का मतलब है। महिलाओं को आजादी हालिस करने का कार्य व्यक्तिगत नहीं है। दुनिया में कभी कोई आजादी संगठित प्रयास के बगैर हालिस नहीं हुई, इसलिए महिलाओं को संगठन बनाने के लिए जूझना होगा, संघर्ष करना होगा एक महिला दूसरे महिला को जाकर समझायेगी तो दूसरी महिला आसानी से मान जायेगी ऐसा हो नहीं सकता दुनिया में ऐसा होता नहीं है। इसलिए संगठन बनाना होगा संगठन बनाने के लिए जनसंपर्क करना पड़ता है। संवाद करना पड़ता है। जन संपर्क का ज्ञान होना चाहिए संवाद का ज्ञान होना चाहिए। और दो व्यक्ति को इकट्ठा लाने के बाद उसको इकट्ठा कैसे लाना चाहिए और उनको कैसे उद्देश्य पूर्ति के लिए कार्य कैसे करवा लेना चाहिए, उनसे रिजल्ट कैसे निकालना चाहिए और जब तक आप रिजल्ट नहीं निकाल सकते तब तक आप संगठित प्रयास करने में कामयाब नहीं हो सकती ये दूसरा संघर्ष आपको करना होगा। और ये संघर्ष करने के लिए आप आपने आप को जब तैयार करोगे तब आजादी हालिस करने का मामला सफल हो सकता है। अन्यथा नहीं हो सकता तीसरा संघर्ष है कि ये जो संगठित संघर्ष आप लोग कर रहे है। केवल संगठन बनानकर आजादी हालिस नहीं होगी। तो संगठन को और संगठित आंदोलन को आपको जन-आंदोलन में रूपांतरित करना होगा। जन-आंदोलन में रूपांतरित करने के लिए बहुत बड़ा संघर्ष करना होगा दीर्घ संघर्ष करना होगा और जन-आंदोलन करने के लिए करोड़ो लोगों को एक ही लक्ष्य के लिए एकही मकसद के लिए एक ही उद्देश्य के लिए लड़ना होगा। जन आंदोलन का मतलब है करोड़ो लोग करोड़ों महिलाएँ उद्देश्य केवल एक उस एक ही उद्देश्य को पूर्ण करने के लिए सभी लोग मिलजुलकर लड़े तो कहा जा सकता है कि ये जन-आंदोलन है। और इसके लिए करोड़ो महिलाओं को इसके अंदर शामिल करवाना होगा और इसके लिए एक बहुत बड़ा आंतरिक और बाह्य संघर्ष करना होगा। और ये आंतरिक संघर्ष बहुत जटिल होता है जो आंतरिक संघर्ष पर विजय नहीं पा सकते वो बाहर के संघर्ष पर कभी विजय हालिस नहीं कर सकते इसीलिए ये ध्यान रखना होगा एक और महत्वपूर्ण बात मैं पुरूषों से कहना चाहता हूँ कि पुरुषों को ये समझना होगा, भारत में जो गुलामी थोंपी गई उसमें गुलामी थोपने वालोंने महिलाओं को आधार बनाया महिलाओं को आधार बनाकर गुलामी थौंपी गयी इसलिए महिलाओं को आजाद किए बगैर भारत में आजादी पुरूषों को भी नहीं मिल सकती है। इसलिए पुरूषों को पहले करना चाहिए अपने आजादी को हालिस करने के लिए पुरूषों को पहल करके महिलाओं को आजाद करना चाहिए। ऐसा करने से उनके आजादी का रास्ता खुलेगा अन्यथा ये रास्ता नहीं खुल सकता बामसेफ के द्वारा सोशल नेटर्विकग का बड़ा कार्यक्रम शुरू किया गया है। सोशल नेटवर्किंग के तहत ये महिलाओं का कार्यक्रम किया जा रहा हैं ये अपने आप में नहीं चल रहा है। इसके लिए बामसेफ संगठन की पूरी ताकत को झोंका गया है इसीलिए ये यहाँ हम देख रहे है कि लोगों को जगह कम पड़ गयी हैं और इसके लिए हम लोगों को संगठित प्रयास केवल चार स्टेट में किया है अगर सारे ३० स्टेट में ये किया होता तो शायद ये हॉल कम पड़ जाता तो बहुत बड़ा खुला ग्राउण्ड बुक करना पड़ता महिलाओं का अलग अधिवेशन करना होगा तो इससे दोगुना चार गुना बढ़ा पण्डाल लगाना होगा तब जाकर के महिलाओं का ये अधिवेशन होगा। तो ये इतना बड़ा हो सकता है ये बामसेफ के द्वारा चलाया गया सोशल नेटवर्किंग का कार्यक्रम है। नौ प्रकार के सोशल नेटवर्किंग है उसमें महिला एक नेटवर्किंग का मामला है। ५० प्रतिशत महिलाओं की संख्या है और इतनी बड़ी संख्या में महिलाओं आजादी हासिल करना कोई कठिन काम नहीं इसीलिए धर्मपरिवर्तित लोगों को महिलाओं को, पढ़ी-लिखी महिलाएँ है वो केवल ह्यूमन नहीं हे वह ह्यूमन रिसोर्स है। वो केवल रोटी बनाने के काम में लगी हुयी है। ये तो मूर्खता की हद होनी चाहिए मुझे ऐसे मूर्ख आदमी पर गुस्से की बजाय दया आती है। कि ऐसा वो क्यों नहीं सोच रहा है। उनके घर के मर्द लोगों को आदमी लोगों ने ये सोचना चाहिए इसीलिए बामसेफ As an organization ये सोशल नेटवर्किंग का कार्यकम है और सोशल नेटवर्किंग के तहत महिलाओं का कार्यक्रम हम देशभर में चला रहे है उसके लिए हम लोगों ने महिलाओं के लिए कार्यक्रम बनाए है कि महिलाओं का जन जागरण करना होगा जागरण करने का क्या मतलब है दोस्त और दुश्मन की पहचान होनी चाहिए। दोस्त कौन है जानना चाहिए दुश्मन कौन है जानना चाहिए। इतिहास क्या है जानना चाहिए कमियाँ क्या है खामियाँ क्या है, कमजोरियाँ क्या है जानना चाहिए कमजोरियाँ कैसे दूर करना है जानना चाहिए कमजोरियाँ दूर करने के तरीके लागू करने का हुनर जानना चाहिए इसको कहते है जागरण दूसरा है प्रशिक्षण, प्रशिक्षण जागरण से बड़ी बात है। जो संगठन की परख, उद्देश्य विचारधारा है उसको प्रशिक्षण देने का एक दिन-दो-दिन-५ दिन लगातार प्रशिक्षण देकर महिलाओं को पुरूषों को अपनी विचारधारा को केंद्रित करने के लिए तैयार करने का तो ये विचारधारा Consantrate करने से ह्यूमन, ह्यूमन नहीं रह जाता है। उसका ह्यूमन रिर्सोस में रूपांतरित हो जाता है। और तब वो ज्यादा काम करने लगता है। तीसरी बात है 'प्रोत्साहन' हमारे परिवारों में ब्राह्मणवाद की वजह से महिलाओं को प्रोत्साहन नहीं दिया जाता है सामाजिक और राष्ट्रीय कार्य करने के लिए महिलाओं को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए प्रेरणा देना चाहिए। चौथा कार्यक्रम है प्रतिनिधित्व जो कार्य करने वाली महिलाएँ है। जो अच्छा काम, अच्छा जनसंपर्क, जनसंवाद करती है। और लोगों को जोड़ती है। ऐसी महिलाओं को प्रतिनिधित्व संगठन में दिया जाना चाहिए और महिलाएँ सफलतापूर्वक प्रतिनिधित्व कर सकती है। उसको नेतृत्व करने की जिम्मेदारी संगठन में दिये जाना चाहिए तो ये पाँचवा। नेतृत्व ऐसा पाँच प्वाईंट प्रोग्राम हम लोगों ने महिलाओं के लिए बनाया है। ये Exclusive है। यही हमारे समाज के स्थिती को ध्यान रखते हुये उनकी गुलामी की वास्तविताओं के जानते हर समाज व्यवस्था जो ब्राह्मणवादी है उस व्यवस्था को जानते हुए ये Consciously कार्यक्रम बनाया गया है। और यही एक कार्यक्रम है जिसकी वजह से सारे देशभर में ये संगठन बनाने का बड़ा प्रयास किया जा रहा है। और इतने बड़े पैमाने पर ये जो सफलता आप लोगों को दिखाई दे रही है इसका मतलब यह जो ५ प्वाईंट प्रोग्राम है प्रोग्राम असर कारक प्रोग्राम है। ऐसा कहाँ जा सकता है। इस मौके पर मैं केवल इतनी ही बात कहना चाहता हूँ ऐसा करने से महिलाओं का संघर्ष राष्ट्रव्यापी संघर्ष होगा और इस संघर्ष के द्वारा गुलामी खत्म करने का कार्य सफल हो सकता है। ऐसा संघर्ष करना होगा। इस आशा और विश्वास के साथ आपने मेरी बात ध्यान से सुनी इसके लिए आभार।
!! जय मूलनिवासी !!🙏

