स्वास्थ्य व्यवस्था में नीट सिस्टम: बहुजनों को प्रतिनिधित्वविहीन करने का षड्यंत्र

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🚨 BREAKING NEWS | स्वास्थ्य व्यवस्था में नीट सिस्टम पर बड़ा आरोप

स्वास्थ्य व्यवस्था में नीट सिस्टम: बहुजनों को प्रतिनिधित्वविहीन करने का षड्यंत्र

नई दिल्ली | Nayak1news

आज देश में एक गंभीर सवाल चर्चा का विषय बना हुआ है — “नीट इज चीट”। नीट केवल एक परीक्षा नहीं, बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था से मूलनिवासी बहुजन समाज को बाहर करने का सुनियोजित षड्यंत्र बन चुका है।

“नीट, स्वास्थ्य व्यवस्था में मूलनिवासियों का प्रतिनिधित्व खत्म करने का भयानक षड्यंत्र है।”

इस विषय पर अपनी बात रखते हुए लेखक ने स्पष्ट कहा कि वे स्वयं नीट व्यवस्था के प्रत्यक्ष भुग्तभोगी हैं। राजस्थान में लगातार तीन वर्षों तक नीट काउंसलिंग में उपस्थित रहकर उन्होंने जो देखा, वह संविधान और आरक्षण व्यवस्था पर सीधा हमला है।

राजस्थान नीट काउंसलिंग: रोस्टर सिस्टम का खुला उल्लंघन

राजस्थान में नीट काउंसलिंग दो चरणों में होती है —

  • प्रथम चरण: ऑनलाइन
  • द्वितीय चरण: ऑफलाइन

ऑफलाइन काउंसलिंग में रोस्टर सिस्टम को पूरी तरह रौंद दिया जाता है

• पहले चरण में अनुसूचित जाति के अभ्यर्थी बुलाए जाते हैं।
• दूसरे चरण में अनुसूचित जनजाति के अभ्यर्थी।
• तीसरे चरण में एमबीसी और ओबीसी।

तीनों चरणों में एससी-एसटी-ओबीसी की 50% सीटें भरवाकर अंतिम चरण में शेष सीटें अनरिज़र्व श्रेणी के लिए छोड़ दी जाती हैं

इस प्रक्रिया में बहुजन समाज का संवैधानिक अधिकार छीना जाता है और सीटें सीधे सवर्णों को दे दी जाती हैं। लेखक ने बताया कि यह सब उन्होंने तीन साल तक अपनी आँखों से देखा

नये मेडिकल कॉलेज और फीस का षड्यंत्र

राजस्थान मेडिकल काउंसिल द्वारा नीट लागू होने के बाद 10 से 15 नये मेडिकल कॉलेज खोले गए।

इन कॉलेजों में —

• 35% सरकारी सीटों को मैनेजमेंट सीट में बदला गया।
• एक सीट की फीस लगभग 10 लाख रुपये प्रति वर्ष तय की गई।

जबकि मूलनिवासी बहुजन समाज के छात्र —

  • 2 साल की कोचिंग में 4–5 लाख रुपये खर्च करते हैं
  • सरकारी कॉलेज की 1–1.5 लाख की फीस भी मुश्किल से भर पाते हैं

ऐसी स्थिति में 10 लाख रुपये की फीस बहुजन छात्रों को व्यवस्था से बाहर कर देती है

सीटें अनरिज़र्व में डालकर सवर्णों को लाभ

जब बहुजन अभ्यर्थी महंगी फीस नहीं भर पाते, तो —

👉 उन सीटों को अनरिज़र्व कोटे में डाल दिया जाता है
👉 और सवर्ण अभ्यर्थियों द्वारा भर दिया जाता है

यह पूरा तंत्र संविधान विरोधी, आरक्षण विरोधी और सामाजिक न्याय के खिलाफ है।

नीट नहीं, नीति बदलो!

स्वास्थ्य व्यवस्था में प्रतिनिधित्व का सवाल केवल रोजगार का नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और जीवन-मरण का सवाल है।

नीट सिस्टम को बिना सुधार लागू रखना, बहुजन समाज के खिलाफ संस्थागत षड्यंत्र को बढ़ावा देना है।

“जब तक नीट व्यवस्था पर पुनर्विचार नहीं होगा, तब तक स्वास्थ्य व्यवस्था में सामाजिक न्याय असंभव है।”

बा ने कहा है!

"बा कहती हैं!"क्या खांसी बार-बार परेशान करती है? गुड़ और काली मिर्च साथ में चबा लो। कफ ढीला होकर बाहर निकलता है। गला साफ रहता है और खांसी शांत होती है."

!! जय मूलनिवासी !!

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