— मा. वामन मेश्राम (राष्ट्रीय अध्यक्ष, बामसेफ)
राष्ट्रीय मूलनिवासी महिला संघ का तीसरा राष्ट्रीय अधिवेशन पूना शहर में आयोजित किया गया। उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता करते हुए मा. वामन मेश्राम साहेब ने महिलाओं की आज़ादी, गुलामी के इतिहास और सामाजिक व्यवस्था पर तीखा विश्लेषण प्रस्तुत किया।
अधिवेशन का विषय
“आजादी मुफ्त में नहीं मिलती है, इसलिए महिलाओं को अपने हिस्से की लड़ाई खुद लड़नी चाहिए” — इस चुनौतीपूर्ण विषय पर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा की गई।
गुलामी समझे बिना आज़ादी नहीं
मेश्राम साहेब ने स्पष्ट किया कि जब तक महिलाओं को यह नहीं बताया जाएगा कि उन्हें गुलाम कैसे बनाया गया, तब तक आज़ादी का संघर्ष शुरू ही नहीं हो सकता।
मातृप्रधान व्यवस्था का सच
भारत की मूल व्यवस्था मातृप्रधान थी। आज विवाह के बाद महिला पति के घर जाती है, लेकिन मातृप्रधान व्यवस्था में पुरुष पत्नी के घर जाकर रहता था।
आज भी जीवित परंपरा
नागालैंड, मिजोरम और खासी जनजातियों में आज भी यह परंपरा जीवित है। यह मूलनिवासी संस्कृति की ताकत का प्रमाण है।
राष्ट्र की मुखिया महिलाएं
मातृप्रधान व्यवस्था में महिलाएं केवल परिवार नहीं, बल्कि राष्ट्र की मुखिया भी हुआ करती थीं।
पितृप्रधान व्यवस्था का आरोपण
यूरेशियन ब्राह्मणों ने यूरोपियन पितृप्रधान व्यवस्था मूलनिवासी समाज पर थोप दी, जिससे महिलाओं की स्वतंत्रता समाप्त कर दी गई।
