आजादी मुफ्त में नहीं मिलती है, इसलिए महिलाओं को अपने हिस्से की लड़ाई खुद लड़नी चाहिए.

0
ब्राह्मणी व्यवस्था और महिला गुलामी | वामन मेश्राम | Breaking News
🚨 BREAKING NEWS | महिला मुक्ति & मूलनिवासी आंदोलन 🚨
📍 पूना / Nayak1News
“ब्राह्मणी व्यवस्था के मानसिक गुलाम होने से ही पुरुष अपनी महिलाओं को गुलाम रखते हैं।”
— मा. वामन मेश्राम (राष्ट्रीय अध्यक्ष, बामसेफ)

राष्ट्रीय मूलनिवासी महिला संघ का तीसरा राष्ट्रीय अधिवेशन पूना शहर में आयोजित किया गया। उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता करते हुए मा. वामन मेश्राम साहेब ने महिलाओं की आज़ादी, गुलामी के इतिहास और सामाजिक व्यवस्था पर तीखा विश्लेषण प्रस्तुत किया।

अधिवेशन का विषय

“आजादी मुफ्त में नहीं मिलती है, इसलिए महिलाओं को अपने हिस्से की लड़ाई खुद लड़नी चाहिए” — इस चुनौतीपूर्ण विषय पर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा की गई।

गुलामी समझे बिना आज़ादी नहीं

मेश्राम साहेब ने स्पष्ट किया कि जब तक महिलाओं को यह नहीं बताया जाएगा कि उन्हें गुलाम कैसे बनाया गया, तब तक आज़ादी का संघर्ष शुरू ही नहीं हो सकता।

मातृप्रधान व्यवस्था का सच

भारत की मूल व्यवस्था मातृप्रधान थी। आज विवाह के बाद महिला पति के घर जाती है, लेकिन मातृप्रधान व्यवस्था में पुरुष पत्नी के घर जाकर रहता था।

आज भी जीवित परंपरा

नागालैंड, मिजोरम और खासी जनजातियों में आज भी यह परंपरा जीवित है। यह मूलनिवासी संस्कृति की ताकत का प्रमाण है।

राष्ट्र की मुखिया महिलाएं

मातृप्रधान व्यवस्था में महिलाएं केवल परिवार नहीं, बल्कि राष्ट्र की मुखिया भी हुआ करती थीं।

पितृप्रधान व्यवस्था का आरोपण

यूरेशियन ब्राह्मणों ने यूरोपियन पितृप्रधान व्यवस्था मूलनिवासी समाज पर थोप दी, जिससे महिलाओं की स्वतंत्रता समाप्त कर दी गई।

बा ने कहा है!

""अचानक घबराहट होने लगे चक्कर आने लगे तो, एक चुटकी चीनी जीभ पर रखो और बैठकर पानी पीओ। दिल की धड़कन और चक्कर शांत होते हैं।"

Original Speech WAMAN MESHRAM SAHAB's

तीसराा राष्ट्रीय मूलनिवासी महिला संघ के अधिवेशन में उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता करते हुए मेश्राम साहेब ने बताया की, आज राष्ट्रीय मूलनिवासी महिला संघ का तीसरा राष्ट्रीय अधिवेशन पूना शहर में हो रहा है। और ये जो राष्ट्रीय अधिवेशन हो रहा है। इस अधिवेशन के उद्घाटन सत्र में जो विषय चर्चा करने के लिए रखा गया है। वो विषय है "आजादी मुफ्त में नहीं मिलती है इसलिए महिलाओं को अपने हिस्से की लड़ाई खुद लड़नी चाहिए एक चुनौती पूर्ण बहस" ये विषय चर्चा करने के लिए रखा गया है। इस विषय पर राष्ट्रीय अधिवेशन के मौके पर कुछ बाते समझाया जाना बहुत जरूरी है। सबसे पहली बात तो ये है कि यदि महिलाओं को आजादी हालिस करनी है तो आजादी हासिल करने की जो लड़ाई है। वो गुलामी जानने से आजादी हासिल करने का मार्ग शुरू होता है। सबसे पहले आजादी हासिल करने की धारणा रखने वाले जो लोग है। तो सबसे पहले उनको गुलाम बनाये जाने का इतिहास मालूम नहीं है। तो गुलामी के विरोध में आजादी हालिस करने का जो संघर्ष है वो संघर्ष शुरू ही नहीं हो सकता तो इसीलिए सबसे पहले इस देश में महिलाओं को गुलामी का इतिहास है वो बहुत लंबा इतिहास है मगर मैं संक्षिप्त में आप लोगों को समझाना चाहता हूँ। सबसे पहले भारत में महिलाओं की जो प्रधान व्यवस्था थी उसके बारे में आज की जो भी पढ़ी लिखी महिलायें है उनके पास जानकारी नहीं है। वे इस देश में मातृप्रधान व्यवस्था हुआ करती थी मेरे सामने हमेशा मातृप्रधान व्यवस्था समझाने के लिए हमेशा ये समझा रही है कि महिलाओं को मातृप्रधान व्यवस्था में कैसे समझाया जाए मैं हमेशा महिलाओं को इस बात को समझाने के लिए कहता हूँ कि आज के तारीख में महिलायें शादी होने के बाद जिस पती के साथ उसकी शादी होनी है। उसके घर में उस पत्नी को अपने माँ-बाप का घर छोड़कर जाना पड़ता है। मगर मातृप्रधान व्यवस्था में पुरूषों को आज की महिलाओं की तरह अपना घर छोड़ के पत्नी के घर जाना पड़ता है। ये बात इसलिए मैं समझा रहा हूँ आज भी ये परंपरा प्रथा, नागालैण्ड, मिजोरम के एरिया में खाँसी नाम की जो ट्राईब है वो आज भी है। जैसे महाराष्ट्र में भिल्ल, गोंड, प्रधान है उसी तरह से खाँसी एक ट्राईब है। आदिवासी है और वहाँ पर आज भी आज के तारीख में भी शादी होने के बाद पुरुष को अपने पत्नी के यहाँ अपने माँ-बाप के घर को छोड़कर जाना पड़ता है। आज भी ये परंपरा को उन्होंनें जीवित रखा है। अपने एरिया में व्यवस्था ये बात इसीलिए मैं आप लोगों को बता रहा हूँ कि आपको ये जो सारी व्यवस्था को उल्टा कर दिया गया उसका कारण मातृप्रधान व्यवस्था है। मातृप्रधान व्यवस्था में महिलायें केवल परिवार की ही मुखिया नहीं हुआ करती थी वो राष्ट्र की भी मुखिया हुआ करती थी। राष्ट्रप्रमुख हुआ करती थी और राष्ट्र को चलाने का काम किया करती थी ये मातृप्रधान व्यवस्था जो यूरेशियन ब्राह्मण भारत में आये उन लोगों ने क्योंकि उनकी जो यूरोपियन और अमेरिकन सिस्टम है अंग्रेजों का सिस्टम है ये पितृप्रधान व्यवस्था है। और ये पितृप्रधान व्यवस्था होने की वजह से जब वो यहाँ आये तो उन्होंने अपनी पितृप्रधान व्यवस्था यहाँ पर लागू की और पितृप्रधान व्यवस्था लागू करने के पीछे क्योंकि उनके साथ तो महिलाएं भी नहीं थी तो उन्होंने पितृप्रधान अपनी संस्कृती यहाँ के मूलनिवासी लोगों पर थोप दी और मातृप्रधान व्यवस्था को समाप्त किया।

#WamanMeshram #महिला_मुक्ति #मूलनिवासी #BAMCEF #BreakingNews

Post a Comment

0 Comments
Post a Comment (0)
To Top