हमारी समस्या गैर-बराबरी की है। वामन मेश्राम साहब
April 09, 2026
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आपने भारत मुक्ति मोर्चा के 14वें राष्ट्रीय अधिवेशन में अध्यक्षीय अभिभाषण करते हुए कहा बामसेफ का 2 दिन का राष्ट्रीय अधिवेशन समाप्त होने के बाद अभी तीसरा दिन चल रहा है। तीसरा दिन समाप्त होने के बाद रात के 9 तक अधिवेशन का 60 प्रतिशत समय समाप्त हो जाएगा। इसका मतलब है कि अधिवेशन का बहुतांश समय आज रात के 9 बजे समाप्त हो जाएगा। इस दृष्टि से यह तीसरा दिन हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण है।
दूसरा महत्वपूर्ण मुद्दा यह है कि तीन दिन का अधिवेशन भारत मुक्ति मोर्चा के 14वें राष्ट्रीय अधिवेशन का उद्घाटन सत्र है। इस उद्घाटन सत्र में मैं केवल दो-तीन महत्वपूर्ण बातें यहाँ पर कहना चाहता हूँ। यह हो सकता है कि रिपीटेशन हो जाए, मगर हमारे लोगों को बात समझने के लिए रिपीटेशन करना बहुत जरूरी होता है। एक बार समझाने से हमारे लोगों के दिमाग में बातें कम घुसती है। यह हमारा 50 साल का बहुत लंबा तजुर्बा है। पहली बात तो दिमाग में कम घुसता है और फिर दिमाग में घुसने के बाद उस तरीके से सोचना और समझना जरुरी है। तीसरा है- समय के अनुसार आचरण करना। समाज में काम करना जरुरी है। इसीलिए बहुत बार बातों को रिपीटेशन करना बहुत जरूरी होता है,क्योंकि लोगों को समझना बहुत जरूरी है और समझने क के लिए रिपीटेशन करना एक उपाय है। इसलिए यह बात थोड़ा सा समझाने के लिए आपको रिपीटेशन लगेगा।
बामसेफ एक बुनियादी संगठन है। यह 32 राज्यों और 625 जिलों में फैला हुआ है। यह बुनियादी ढाँचा सारे देशभर में बन चुका है। इतना बड़ा संगठन का ढाँचा बनाने के लिए जिंदगी का बहुत लंबा समय लग गया है। मैं 19 साल की उम्र से यह काम कर रहा हूँ। अभी मेरी उम्र 68 वर्ष चल रही है। आन्दोलन का काम करते हुए 48 साल से ज्यादा समय हो गया है। इतने लंबे समय से मैं यह काम कर रहा हूँ और इतना लंबा समय बामसेफ का बेसिक संगठन बनाने के लिए लगा है। क्योंकि बेसिक संगठन बनाने के लिए बहुत ज्यादा समय इसलिए लग जाता है, क्योंकि लोगों को देने के लिए तैयार करना पड़ता है। हमारे लोगों की मांगने की आदत है और जो लोग देने लायक हो गए, उनकी भी मांगने की ही आदत है। जो लोग अनपढ़ और साधन-संसाधनों से वंचित है, उनके मांगने की बात समझ में आती है, मगर जिन लोगों को फुले-शाहू-अंबेडकर के आंदोलन की बदौलत फायदा मिला है, उनके पास समझदारी का अभाव है। ज्यादातर लोग ऐसा कहते रहते हैं कि यह बाबासाहब अंबेडकर का आन्दोलन है। मैं 2 दिन से देख रहा हूँ जितने बोलने वाले लोग हैं, वे केवल बाबासाहब अंबेडकर बोलते रहते हैं। केवल बाबासाहब अंबेडकर की बात करने वाले लोगों को मैं ऐसा मानता हूँ कि इनके अन्दर समझदारी नहीं है। जबकि बाबासाहब अंबेडकर कहते हैं कि फुले-शाहू की वजह से मैंने यह आंदोलन खड़ा किया। बाबासाहब अंबेडकर ही ऐसा कहते हैं तो हम लोगों को ऐसा कहने के लिए क्या दिक्कत है?
आप लोगों को यह बात समझ में आती है कि नहीं आती है, मगर मैं जानता हूँ। मैं अपने लोगों का, अपने समाज का और देश में जो मनोविज्ञान है, उसको मैं जानता हूँ। जब कोई आदमी केवल बाबासाहब अंबेडकर की बात करता है, तो ऐसा मैसेज जाता है कि यह केवल अनुसूचित जाति के लोगों का संगठन है। जबकि यह बहुत कम लोगों को जानकारी है कि यह हमारे पुरखे फुले-शाहू-अंबेडकर के बदौलत ही यह आंदोलन है। अगर इसकी बात करेंगे तो ऐसा समझ में आएगा कि यह एससी, एसटी, ओबीसी और इसे कन्वर्टेड माइनॉरिटी के सभी लोगों की बात कर रहे हैं, केवल बात कर नहीं रहे हैं बल्कि जब भी कोई फैसला करने का समय आता है, तो सभी लोगों को ध्यान में रखकर फैसला करते हैं। सभी लोगों को ध्यान में रखते हुए जब संविधान लिखने का समय आया तो बाबासाहब अंबेडकर ने इन तमाम लोगों को ध्यान में रखा और ध्यान में रखकर उनके अधिकारों को हाशिल करने कि कोशिश की कि उनको रिकॉर्ड में लाया जाए। क्योंकि दो-तीन हजार साल से उनके अधिकारों को रिकॉर्ड में नहीं रखा गया था और उनके अधिकारों को बाबासाहब अंबेडकर के द्वारा संविधान के अंदर रिकॉर्ड में लाया गया और संविधान के अंदर रिकॉर्ड में लाने की वजह से क्या होता है? यह भी हमारे लोगों को समझ में नहीं आता है।
संविधान की अंदर रिकॉर्ड में लाने की वजह से अगर सरकार, प्रशासन, व्यवस्थापन और एडमिनिस्ट्रेशन में कोई विवाद निर्माण होता है तो अंतिमतः यह मामला हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में जाता है और फिर जो संविधान में लिखा हुआ है, उसके अनुसार सुप्रीम कोर्ट फैसला देता है। तो अंतिमतः संविधान क्या करता है? आप लोगों को मालूम नहीं है कि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अदर बैकवर्ड क्लास और माइनॉरिटी के लोगों को तमाम अधिकार और विशेषाधिकार मिले हुए हैं जो दूसरे लोगों को नहीं मिले हैं। किन लोगों को रिजर्वेशन मिला? एससी, एसटी, ओबीसी और माइनॉरिटी के लोगों को रिजर्वेशन मिला। दूसरे लोगों को रिजर्वेशन नहीं मिला। इनको रिजर्वेशन मिला, मतलब यह विशेष अधिकार है।
अगर यह विशेष अधिकार है, तो यह विशेष अधिकार हमारे लोगों को कांसियस्ली दिया गया है। ये विशेष अधिकार है और विशेष अधिकार होने के बावजूद भी जितने भी सुप्रीम कोर्ट में फैसले दिए गए हैं, वह संविधान की वजह से हमारे लोगों के फेवर में देना पड़ता है। इसका संविधान का मतलब यह है कि जब कोई विवाद निर्माण होता है, तो संविधान के आधार पर सुप्रीम कोर्ट में फैसला होता है और फिर वह फैसला हमारे फेवर में करना पड़ता है। उसके लिए वह मनुस्मृति का या भारत के ब्राह्मणों के धर्म ग्रंथों का सहारा नहीं ले सकते हैं, जबकि उनका माइंड इस तरह से बना हुआ है। उनका माइंड इस तरह से बना होने के बावजूद भी वह ऐसा फैसला नहीं कर सकते हैं।
अभी लोगों में अवेयरनेस ज्यादा हो गया है। 1950 और 1960 के दरमियान जो अवेयरनेस था और अभी 2024 चल रहा है, अभी अवेयरनेस का लेवल बहुत ऊँचा हो गया है। अभी साधारण आदमी भी हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में चला जाता है और वह लड़ाई लड़ता है। उसके लिए भी फैसिलिटी है। उसको मुफ्त में वकील मिल जाता है। वह लड़ाई वहाँ लड़ता है। यह भी फैसिलिटी है। उसको फैसिलिटी उपयोग करने का अधिकार दिया गया है। इसलिए मैं आप लोगों को एक खास बात समझा रहा हूँ कि बहुत सी बातें जो संविधान में है, वह हमारे पढ़े-लिखे लोगों को पता नहीं है। और उस पर अमल करने के बारे में जो शासक वर्ग है, वह शासक वर्ग अमल नहीं कर रहा है। इसलिए भारत मुक्ति मोर्चा का एक बड़ा मकसद संविधान को अमल करवाने का है।
संविधान को अमल करवाने के दो तरीके हैं। एक तरीका है कि जो वर्तमान शासक वर्ग है, उनसे संविधान पर अमल करवाया जाए। और दूसरा तरीका है कि शासन सत्ता पर नियंत्रण प्रस्थापित करके खुद ही संविधान पर अमल किया जाए। ये दो बातें हैं। आज के तारीख में शासन सत्ता पर हमारा नियंत्रण नहीं है। शासन सत्ता में हमारे एमएलए है, हमारे एमपी है, हमारे मंत्री है और हमारे लोग कहीं-कहीं मुख्यमंत्री हो जाते हैं, उन लोगों को शासक वर्ग की पार्टी में मंत्री और मुख्यमंत्री बनाया जाता है। इसलिए उनको ध्यान में रखना पड़ता है कि हमारे पार्टी के लोग नाराज तो नहीं होंगे। इसलिए उसके अनुसार उसपर अमल करना पड़ता है। इसलिए वह बहुत ज्यादा पहल नहीं कर सकता है और पहल करने के बाद में उसका पोलिटिकल कैरियर समाप्त हो सकता है और भविष्य में पार्टी उनके ऊपर इनडायरेक्टली बैन लगा देती है और भविष्य में उसका पोलिटिकल कैरियर चौपट हो। जाता है। उसका पोलिटिकल कैरियर खत्म हो जाता है। हम लोगों ने भारत मुक्ति मोर्चा को संविधान पर अमल करवाने के मकसद के लिए निर्मित एक संगठन है। संविधान पर अमल करवाने के लिए आंदोलन करना एक बात है।
दूसरा मकसद क्या है? दूसरा मकसद है कि हम लोग मासेस का आंदोलन और जन-आंदोलन करना चाहते। हम लोग मासेस का आंदोलन और जन-आंदोलन क्यों करना चाहते हैं? क्योंकि हमारा एक यह लक्ष्य है कि हम लोग ब्राह्मणवाद से लिबरेट होना चाहते हैं।
ब्राह्मणवाद से लिबरेट होने के लिए दो तरीके हैं। एक तरीका है-मानसिक रूप से से लिबरेट करने का। और दूसरा है-राजनीतिक रूप से से लिबरेट करने का। जब तक हम लोग मानसिक रूप से लिबरेट नहीं होते हैं, तब तक हम राजनीतिक रूप से भी लिबरेट नहीं हो सकते हैं। लिबरेट नहीं हो सकते हैं का मतलब है कि आजादी हासिल कर नहीं सकते हैं। इसलिए मानसिक रूप से लिबरेट होने के लिए जो चीजें समाज में घटित होती है, देश में घटित होती है, उसके बारे में हम लोग पाँच-पाँच दिनों तक चर्चा करते हैं। हम लोग जिला लेवल के कार्यक्रम में चर्चा करते हैं, फिर राज्य लेवल के कार्यक्रम में चर्चा करते हैं, फिर जोनल लेवल के कार्यक्रम में चर्चा करते हैं, फिर राष्ट्रीय लेवल के कार्यक्रम में पाँच-पाँच दिनों तक सब्जेक्ट रखकर चर्चा करते हैं। यह चर्चा करने के पीछे का मौलिक रूप से मकसद होता है कि हम लोग हमारे लोगों को मानसिक रूप से मुक्त
करना और मानसिक रूप से सशक्त बनाना चाहते हैं। एक ब्राह्मणीकल सोशल ऑर्डर है. उसकी एक मानसिकता है और हमारे लोग उसी में फंसे हुए हैं। इसलिए ब्राह्मणीकल सोशल ऑर्डर मुक्त करने का एक
मकसद है। तो सबसे बडी मानसिकता क्या है? हमारे लोग ऐसा कहते हैं कि अरे ! अंधविश्वास है, पाखंड है। ऐसा मैं सुनते रहता हूँ। हमारे लोग बोलते रहते हैं तो मैं सुनते रहता हूँ। अंधविश्वास और पाखंड समस्या नहीं है। हमारे लोग यही कहते रहते हैं। हमारे लोगों के पास जितना दिमाग है, वह उतना ही कहेंगे। जितनी उनकी औकात है, वे उतना ही पकड़ेंगे ना, ज्यादा थोडे ही पकड़ सकते हैं। चीजों को पकडने के लिए इन्सान के दिमाग की एक औकात होती है। इसलिए वे उतना ही पकड़ते रहते हैं कि अंधविश्वास है और पाखंड है। अंधविश्वास और पाखंड हमारी समस्या नहीं है।
हमारी मूल समस्या गैर-बराबरी की व्यवस्था है। जो वर्ण व्यवस्था है, जाति व्यवस्था है, अस्पृश्यता है, आदिवासियों का सेग्रीगेशन है, महिलाओं की दासता है, शुद्रत्व पिछड़े वर्ग पर थोपा जाना है, यह ब्राह्मणवाद है। यह है मौलिक समस्या। अंधविश्वास और पाखंड मौलिक समस्या नहीं है। मगर हमारे पढ़े-लिखे लोगों की भी जो दिमागी औकात है, वह पाखंड और अंधविश्वास तक ही जाती है। उसको उतना ही पकड़ में आता है। इसलिए आपलोग असली समस्या को समझो। मान लो कि अंधविश्वास और पाखंड खत्म हो गया, मगर वर्ण व्यवस्था तो फिर भी बचा रहेगा, जाति व्यवस्था तो फिर भी बचा रहेगा, अस्पृश्यता तो फिर भी बचा रहेगा, आदिवासियों का सेग्रीगेशन तो फिर भी बचा रहेगा, महिलाओं की दासता तो फिर भी बचा रहेगा, शुद्रत्व पिछड़े वर्ग पर थोपा जाना तो फिर भी बचा रहेगा। अब हमारे बहुत सारे लोगों का और पढ़े-लिखे लोगों का अंधविश्वास खत्म हो गया। वह अंधविश्वास और पाखंड को जब समस्या मानता है और उसका अपने लेवल पर हल कर लेता है, तो वह कहता है कि समाधान हो गया है और वामन मेश्राम और बामसेफ की कोई जरूरत नहीं है। वामन मेश्राम और बामसेफ खामोखा पाँच-पाँच दिन तक दिमाग खराब करने का काम चलाते रहता है, यह फालतू बातें है। इसकी क्या जरूरत है? पाँच-पाँच दिन तक दिमाग खराब करने की क्या जरुरत है? समस्या का समाधान हो गया है। पाखंड खत्म हो गया है। अंधविश्वास खत्म हो गया है। पाखंड और अंधविश्वास के बाद वर्ण व्यवस्था का, जाति व्यवस्था का, अस्पृश्यता का, आदिवासियों का सेग्रीगेशन का, महिलाओं की दासता का, शुद्रत्व पिछड़े
वर्ग पर थोपाने का मामला ऐसे बना ही रहता है। इसलिए यह मूल बात है और यह बातें इतना ज्याद प्रभावित है, इतना ज्यादा जकड़न है कि हमारे लोग जिस जाति व्यवस्था के शिकार है, जो बामसेफ के बाहर है, -उसको भी अपनी जाति प्रिय है। नहीं है? है। अगर कोई बोले की मुझे प्रिय नहीं है, मगर उसको भी प्रिय है। जब तक कोई पढ़ा लिखा और समझदार आदमी जाति के विरोध में अपनी मानसिकता का निर्माण नहीं करता है, तब तक वह आजाद नहीं हो सकता है। यह पहली और प्राथमिक बात है।
पहली और प्रथामिक बात है कि अपनी मानसिकता जाति के विरोध में निर्माण करें। फिर दूसरी बात, दिमाग को जाति के आधार पर बनाई हुई व्यवस्था के विरोध में मानसिकता का निर्माण करें। फिर तीसरी बात, इसको खत्म करने वाला संगठन बनाने के लिए पहल करें। फिर चौथी बात, संगठन बनाकर ऐसा कार्यक्रम चलाएं की इसको खत्म किया जाए और इसके लिए अगर मान लो कि जेल में जाना पड़े, तो जेल में जाने के लिए तैयार रहना चाहिए। मैं गुजरात में एक दिन जेल में जाकर आ गया हूँ। बामसेफ के लोगों को जो कर्मचारी लोग है, उनको छोड़ो दो, मगर जो कर्मचारी नहीं है, उन लोगों को इस मकसद के लिए जरूर कम से कम एक दिन जेल में जाकर आना चाहिए। अगर वह जेल से जाकर वापस आएगा तो जेल का डर ही खत्म हो जाएगा।
पहली बात क्या होगा? पहली बात उसको जेल का डर खत्म हो जाएगा और कहेगा कि इसके लिए तो दो-चार दिन जेल में थोड़ा और होना चाहिए। इसके लिए वह और लड़ाई लड़ने के लिए तैयार हो जाएगा। उसका डर खत्म हो जाएगा, नहीं तो सरकार कहती है कि ऐसा करोगे तो जेल में डाल देंगे। एक दिन जेल में जाकर अगर कोई आदमी वापस आ गया, तो वह कहता है कि ठीक है, मुझे जेल में ले जाओ। इसलिए जेल में जाने के लिए हमें तैयार रहना चाहिए। अगर आप तैयार नहीं होते हैं, तो मैं ही जेल में जाने के लिए तैयार करने वाला हूँ। जेल भरो आन्दोलन शुरू कर देतें हैं जो आएगा, उसको जेल में जाना ही पड़ेगा। जो नहीं आएगा, वह घर में रहेगा, तो कोई बात नहीं है। वह आज नहीं आएगा, परसों आएगा, परसों नहीं आएगा, नरसो आएगा। अगर इस शुक्रवार को नहीं आएगा, तो अगले जुम्मे को आएगा। - इस जुम्मे को नहीं आएगा, तो अगले जुम्मे को आएगा। - अगले जुम्मे को नहीं आएगा, तो अगले साल के जुम्मे - को आएगा। आखिर जाएगा कहाँ? उधर जाएगा तो जूता - खाएगा। इधर आएगा तो, जूते से मुक्ति होगी। इसलिए - इधर ही आना होगा और कोई विकल्प नहीं है। इस शुक्रवार और अगले शुक्रवार का फर्क हो सकता है। इस हफ्ते का शुक्रवार और अगले साल का शुक्रवार का फर्क हो सकता है। मगर उसको आना जरूर होगा। इसलिए आंदोलन के दिशा में हम लोग आगे बढ़ रहे हैं। हमारा मकसद है कि हम लोग आंदोलन की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। दिसंबर में यह राष्ट्रीय अधिवेशन पूर्ण होते ही अगले साल जनवरी से आंदोलन का कार्यक्रम शुरू होने वाला है। दिसंबर समाप्त होते ही अगले साल जनवरी से राष्ट्रीय स्तर पर आंदोलन का कार्यक्रम घोषित हो जाएगा। अभी यह राष्ट्रीय अधिवेशन 22 दिसंबर को खत्म हो जाएगा, तो यह साल खत्म होने के लिए फिर आठ दिन का समय रहेगा। हमारे पास अब भारत मुक्ति मोर्चा नाम का जो संगठन है, यह संगठन ऑलरेडी बनाउ हुआ है और जहाँ संगठन बना हुआ नहीं है। आप यहाँ से जाकर तीन दिन में संगठन बना सकते हैं। जो 40 साल की उम्र के गैर कर्मचारी लोग हैं, उनका भारत मुक्ति मोर्चा का प्रौढ़ यूनिट बनाओ। विद्यार्थी का, युवा का, बेरोजगार का, महिला का, किसान का और मजदूर का संगठन बनाओ। जितने जगह पर संगठन का यूनिट बनेगा, उतने जगहों पर लोगों को सड़क पर उतरना चाहिए और आंदोलन करना चाहिए।
आंदोलन करने के लिए सड़क पर आना चाहिए और वह सड़क चुनना चाहिए जो चौराहे पर है। जहाँ पर चार जगहों से सड़क गुजरता है, वहाँ जाकर आप लोगों को बैठना चाहिए, तो ट्रैफिक जाम हो जाएगा। घंटा भर या दो घंटा, जितनी औकात है। मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि बहुत ज्यादा। चौराहे पर यह सोचकर जाना है कि जेल में जाना पड़ सकता है। यह सोच कर जाना चाहिए। जो जेल में जाएगा, उसको मैं सर्टिफिकेट दूँगा कि ये लड़ाई लड़ने वाला है। उसका उधर टेस्ट होगा। यहाँ टेस्ट नहीं होगा, यहाँ हमारी गवर्नमेंट है। यहाँ हमारा राज चलता है। वहाँ पर जहाँ दूसरों के गवर्नमेंट चलती है, वहाँ पर हम लोग अपनी बात चलाएंगे। उसके लिए अगर वह जेल में लेकर जाते हैं, तो खुशी-खुशी जेल में जाएंगे। अपने हक-अधिकार और आजादी हासिल करने के लिए जो लोग जेल में जाने के लिए तैयार होते हैं तो यह क्रमबद्ध तरीके से 2030 तक 15 करोड़ लोगों को जेल में जाने के लिए तैयार करने का कार्यक्रम है। 6 लाख गाँवों से 15 करोड़ लोगों को जेल में भेजने की तैयारी का कार्यक्रम बनाया गया है। अगर 15 करोड़ लोग जेल में जाने के लिए तैयार हो गए, तो समझ लो आप आजादी हासिल करने के लायक हो गए। फिर उन लोगों की ईंट से ईंट बजा देंगे।
कांशीराम जी कहते थे कि एक ईंट का जवाब दो पत्थर से देंगे। ईंट का जवाब ईंट से देंगे, समाज में ऐसी यह कहावत है। कांशीराम जी कहते थे कि एक ईंट का जवाब दो पत्थर से देंगे। अब इसका क्या मीनिंग है?
ईंट पत्थर के मुकाबले अंदर से कमजोर होती है। पत्या ज्यादा मजबूत होता है। एक इट का जवाब दो पत्थर है देंगे। कांशीराम जी ऐसा कहा करते थे। कांशीराम बगैर सोचे समझे थोडे ही बोलते थे। कांशीराम जी हमारे लोगों का मनोविज्ञान देखकर बोलते थे। इसलिए कांशीराम जी कहा करते कि एक ईंट का जवाब दो पत्थर से देंगे। यह लडाई है और यह लड़ाई हम लोगों को इस तरीके से लड़नी है।
करने का है। चूँकि हम लोग इस देश में आजादी चाहते हैं। 15 अगस्त, 1947 को अंग्रेजों से मिली हुई आजादी, सब लोगों की आजादी है। ऐसा ब्राह्मण लोग प्रपोगेंडा कर रहे हैं। मगर यह रियलिटी नहीं है। यह सच्चाई नहीं है इसलिए संविधान के आर्टिकल-19 के तहत आंदोलन हमारे पास अधिकार बाबासाहब अंबेडकर ने बगैर सोचे समझे संविधान में आर्टिकल-19 नहीं रखा। तथाकथित आजादी मिलने के बाद बाबासाहब अंबेडकर ने संविधान लिखा। तथाकथित आजादी के लिए आंदोलन चलाया गया और तथाकथित आजादी मिलने के बाद संविधान लिखा और तथाकथित आजादी मिलने के बाद में फिर आजादी की बात संविधान में लिखा। बातें लोगों को समझ में आनी चाहिए। आर्टिकल-19 आप पढ़ो। अरे ! 15 अगस्त को आजादी मिल गई, तो फिर आजादी के लिए संविधान में आर्टिकल-19 क्यों रखा? दूसरे लोग कम जानते थे, मगर बाबासाहब अम्बेडकर जानते थे कि यह आजादी तो हमारी है ही नहीं।
हमारे लोग आजाद नहीं हुए हैं। अंग्रेजों से ब्राह्मण आजाद हो गए और अंग्रेजों से सत्ता ब्राह्मणों को ट्रांसफर हुई। उसका सबूत है कि पंडित जवाहरलाल नेहरू नाम का ब्राह्मण देश का प्रधानमंत्री हो गया है। और यह आजादी संगठित शक्ति के बल पर उन्होंने हासिल की। गांधी के द्वारा उन्होंने जन-आंदोलन चलाया। उस जन-आंदोलन में एससी, एसटी, ओबीसी, कुनबी, मराठा लोगों ने सहभाग लिया, तो हमारे सहभागिता की वजह से जन-आंदोलन हुआ और वे लोग आजाद हुए।
इससे यह साबित हो जाता है कि हमारे लोगों के बदौलत वे लोग आजाद हुए। तो हम लोग अपने बदौलत अपने लोगों को आजाद क्यों नहीं कर सकते हैं? यह एक बात हमारे लोगों को सीखने के लिए और फिर उसके आधार पर आंदोलन को भारत मुक्ति मोर्चा बनाया गया। इतनी बात कहना था। इतना ही बात मैं कहना चाहता हूँ। आपने इसी के साथ जन-आंदोलन करने के लिए अपनी बात समाप्त की।
जय मूलनिवासी
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