महापुरुषों का अपमान, स्वयं का सम्मान

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महापुरुषों का अपमान, स्वयं का सम्मान

महापुरुषों का अपमान, स्वयं का सम्मान

जब बात सम्मान की आती है, तो हमारे माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी का नाम सबसे पहले ज़ेहन में आता है—ख़ासकर तब, जब वह सम्मान देने की बजाय लेने में माहिर दिखते हैं। सोचिए, उनका जन्मदिन आएगा और पूरा देश "श्रद्धांजलि" देगा—अरे भाई, अभी तो वे ज़िंदा हैं, फिर यह शोक सभा क्यों? शायद यह नया ट्रेंड है, जहाँ महापुरुषों को सम्मान देने की जगह पहले अपनी पीठ थपथपाई जाती है।

बाबासाहेब अंबेडकर की जयंती पर दिखावा

और फिर 14 अप्रैल को बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर की जयंती पर बधाई देने का ढोंग—वह भी एडवांस में! वाह, क्या तैयारी है! लगता है, महापुरुषों को याद करने का कैलेंडर अब सरकारी इवेंट्स से चलता है, सच्ची श्रद्धा से नहीं।

सम्मान की राजनीति या राजनीति का सम्मान?

अब सम्मान भी राजनीति का हिस्सा बन चुका है। महापुरुषों की छवि का इस्तेमाल अपने लाभ के लिए करना अब सामान्य बात हो गई है। लेकिन सच्चा सम्मान दिखावे से नहीं, उनके विचारों को अपनाने से होता है।

निष्कर्ष: महापुरुषों का सम्मान केवल शब्दों या सरकारी इवेंट्स में सिमटकर नहीं रहना चाहिए। उनके विचारों को अपनाना ही उनका सच्चा सम्मान है।

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