जाति व्यवस्था-निर्मूलन
जाति व्यवस्था पर आधारित असमानता को चुनौती देने वाला यह वैचारिक दस्तावेज़ डॉ. भीमराव अम्बेडकर की उस ऐतिहासिक सोच से प्रेरित है, जिसने भारतीय समाज को आत्ममंथन के लिए मजबूर किया। यह लेख उनके विचारों की समकालीन व्याख्या है, जिसे समाचार शैली में प्रस्तुत किया गया है।
द्वितीय संस्करण : प्रस्तावना का सार
डॉ. अम्बेडकर द्वारा तैयार किया गया यह भाषण मूलतः उन लोगों को संबोधित था, जो हिंदू समाज की आंतरिक संरचना को समझना चाहते थे। इसके पहले संस्करण को व्यापक पाठक वर्ग का समर्थन मिला और कम समय में इसकी सभी प्रतियाँ समाप्त हो गईं। इसके बाद विभिन्न भारतीय भाषाओं में इसका रूपांतरण शुरू हुआ, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि यह विषय केवल एक वर्ग तक सीमित नहीं है।
नए संस्करण में लेखक ने मूल भाषण की शैली को बनाए रखा, ताकि उसकी वैचारिक तीव्रता बनी रहे। साथ ही, कुछ अतिरिक्त परिशिष्ट जोड़े गए, जिनमें समकालीन आलोचनाओं और उनके तर्कपूर्ण प्रत्युत्तर को स्थान दिया गया।
ब्राह्मणवाद और जाति व्यवस्था पर प्रश्न
डॉ. अम्बेडकर के अनुसार, यदि जाति व्यवस्था का अंत होता है तो उससे सबसे अधिक प्रभाव उस सामाजिक ढांचे पर पड़ेगा, जिसे सदियों से विशेषाधिकार प्राप्त रहे हैं। ऐसे में यह अपेक्षा करना कि वही वर्ग इस व्यवस्था को समाप्त करने के आंदोलन का नेतृत्व करेगा, एक कठिन प्रश्न बन जाता है।
वे यह भी स्पष्ट करते हैं कि तथाकथित प्रगतिशील और परंपरावादी वर्गों के बीच किया जाने वाला अंतर व्यवहारिक रूप से अर्थहीन है, क्योंकि अंततः दोनों की सामाजिक जड़ें एक ही व्यवस्था से जुड़ी हैं।
यह लेख किसी मूल ग्रंथ की प्रतिलिपि नहीं है, बल्कि अम्बेडकरवादी विचारधारा से प्रेरित एक स्वतंत्र समाचार-आधारित प्रस्तुति है।
बा ने कहा है "एक चमच देशी घी+एक चमच अजवाइन+दाल चीनी पावडर+एक चमच गुड डालकर हिलाते हुए पकाएं फिर उसमे एक चमच हल्दी डाले आधा ग्लास पानी डाले ,पानी आधा हो जाए तब तक पकाए और हरोज सुबह साम खाली पेट ले मासिक बंद आ जाएंगे और खुलकर आएंगे।"
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