मनुस्मृति: एक "जीवित अतीत" जो वर्तमान को प्रभावित करती है.
स्त्रियों और शूद्रातिशूद्रों की गुलामी का मुख्य आधार
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"मनुस्मृति अतीत नहीं, वर्तमान है" - डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर
डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने अपने ऐतिहासिक ग्रंथ "रिडल्स इन हिंदुइज्म" में लिखा:
"Manu is not a matter of the past. It is even more than a past of the present. It is a 'living past' and therefore as really present as any present can be."
यह स्पष्ट करता है कि मनुस्मृति केवल प्राचीन ग्रंथ नहीं है, बल्कि एक ऐसा विचार है जो आज भी समाज की बुनियादी संरचनाओं को प्रभावित करता है।
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मनुस्मृति के कारण समाज पर पड़े नकारात्मक प्रभाव
1. स्त्रियों पर थोपे गए प्रतिबंध
घर में स्त्री का द्वितीय दर्जा।
शिक्षा, संपत्ति और स्वतंत्रता के अधिकारों से वंचित।
पुरुष प्रधान मानसिकता का मूल स्रोत।
2. शूद्रातिशूद्रों की गुलामी
उन्हें समाज में अधिकारहीन नागरिक बना दिया गया।
उनके लिए केवल सेवा और गुलामी का जीवन निर्धारित किया।
अत्याचार और भेदभाव को वैधता दी।
3. जातिगत शोषण और असमानता
SC, ST, OBC वर्गों के खिलाफ अत्याचार और बलात्कार।
भट और बनिया वर्ग का विशेष संरक्षण।
जाति आधारित जनगणना का न होना।
शूद्रातिशूद्रों के लिए आर्थिक और सामाजिक प्रगति के द्वार बंद।
4. कृषि और अर्थव्यवस्था पर प्रभाव
किसानों और शेतमाल को उचित मूल्य न मिलना।
जातिवादी संरचनाओं ने ग्रामीण समाज को शोषण का शिकार बनाया।
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महात्मा जोतिराव फुले का आह्वान
महात्मा फुले ने कहा:
"जला दो इस मनुस्मृति को, यह समाज में अन्याय और गुलामी का प्रतीक है।"
यह केवल ग्रंथ को जलाने की बात नहीं थी, बल्कि उस मानसिकता को नष्ट करने का संदेश था जो समाज को बांटती और शोषित करती है।
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स्त्री मुक्ति और मनुस्मृति दहन दिवस (25 दिसंबर)
25 दिसंबर का दिन सिर्फ एक ऐतिहासिक घटना नहीं है, यह:
स्त्रियों की मुक्ति का प्रतीक है।
शूद्रातिशूद्रों की समानता के लिए संघर्ष का प्रतीक है।
समाज में न्याय और समानता की स्थापना का आह्वान है।
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निष्कर्ष
मनुस्मृति केवल एक किताब नहीं, बल्कि एक विचारधारा है जिसने समाज में असमानता और शोषण को जन्म दिया। डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर और महात्मा जोतिराव फुले के विचार हमें इस मानसिकता के खिलाफ लड़ने और समानता का समाज बनाने की प्रेरणा देते हैं।
मनुस्मृति दहन दिवस के अवसर पर सभी स्त्रियों और शूद्रातिशूद्रों को शुभकामनाएं।