जाति व्यवस्था-निर्मूलन
डॉ. भीमराव अम्बेडकर का ऐतिहासिक पत्र
महोदय,
मुझे आपका 22 अप्रैल का पत्र प्राप्त हुआ। मुझे खेद है कि यदि मैंने अपने भाषण को सम्पूर्ण रूप में छापे जाने का आग्रह किया तो जातपांत तोड़क मंडल की स्वागत समिति 'सम्मेलन को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर देगी।' इसके उत्तर में मैं सूचित करना चाहता हूँ कि यदि मंडल मेरे भाषण में अपनी परिस्थितियों के अनुकूल काट-छांट करने पर जोर देगा तो मैं भी सम्मेलन रद्द कराना चाहूँगा। मैं अस्पष्ट शब्दों को प्रयोग करना पसंद नहीं करता। आप मेरे इस निर्णय को पसंद नहीं करेंगे, किंतु मैं सम्मेलन की अध्यक्षता करने के सम्मान की खातिर उस आजादी का परित्याग नहीं कर सकता, जो प्रत्येक अध्यक्ष को अपने भाषण को तैयार करने में मिलनी चाहिए। मैं मंडल को खुश करने के लिए अपने उस कर्तव्य को भी तिलांजली नहीं दे सकता, जो किसी सम्मेलन की अध्यक्षता करने वाले व्यक्ति को सही और उचित मार्गदर्शन करने के लिए प्राप्त होती है। यह एक सिद्धान्त का प्रश्न है और मैं महसूस करता हूँ कि मुझे किसी भी प्रकार से इससे समझौता नहीं करना चाहिए।
स्वागत समिति ने जो निर्णय लिया है, मैं उसके औचित्य के बारे में किसी विवाद में नहीं पड़ना चाहता था, किंतु चूँकि आप ऐसे कुछ कारण दिए हैं, जिनसे मुझ पर दोष आरोपित होता हो इसलिए मैं उनका उत्तर देने के लिए बाध्य हूँ। सर्वप्रथम, मुझे उस धारणो को दूर कर देना चाहिए कि भाषण के उस अंश में व्यक्त विचार, जिन पर समिति ने आपत्ति की है, मंडल के सामने अचानक ही उपस्थित हुए हैं। मुझे विश्वास है कि श्रीसंत राम इस बात की पुष्टि करेंगे। मेरा कहना है कि उनके एक पत्र के उत्तर में मैंने कहा था कि जातिप्रथा को तोड़ने का वास्तविक तरीका अंतरजातिय भोज और अंतरजातिय विवाह नहीं है, बल्कि उन धार्मिक धारणाओं को नष्ट करना है, जिन पर जातिप्रथा की नींव रखी गई है और श्रीसंत राम ने इसके प्रत्युत्तर में मुझसे उस बात को स्पष्ट करने को कहा था और माना था कि यह एक नवीन दृष्टिकोण है।
श्रीसंत राम के इस अनुरोध के उत्तर में मैंने सोंचा कि उनको लिखें गए अपने पत्र के एक वाक्य में जो बात मैंने कही थी, उसे अपने भाषण में विस्तार से समझा देना चाहिए। इसलिए आप यह नहीं कह सकते कि जो विचार मैंने व्यक्त किए हैं, वे नये हैं। किसी भी प्रकार से ये विचार श्रीसंत राम जो, आपके मंडल की जान और इसके प्रमुख मार्ग दर्शक हैं, के लिए नये नहीं हैं, परन्तु मैं इससे भी आगे यह कहता हूँ कि मैंने अपने भाषण का यह अंश केवल इसलिए नहीं लिखा है कि मैंने ऐसा करना वांछनीय समझा हैं, बल्कि इसलिए लिखा है कि तर्क को पूरा करने के लिए अंश पर आपकी समिति को आपत्ति है, उसे आप 'असंगत और अप्रासंगिक' बताते हैं।
मैं बताना चाहता हूँ कि मैं एक वकील हूँ और प्रासंगिक के नियमों को उतनी अच्छी तरह जानता हूँ, जितना आपकी समिति का कोई सदस्य जानता है। मैं जोर देकर कहता हूँ कि जिस अंश पर आपत्ति की गई है, वह न केवल सबसे अधिक प्रासंगिक है, बल्कि महत्वपूर्ण भी है। भाषण के उसी अंश में मैंने जातिप्रथा को नष्ट करने के सर्वोत्तम उपाय के रूप में जिस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ, वह चौंकाने वाला और कष्टकरी हो। आपको यह कहने का अधिकार है, कि मेरा विश्लेषण गलत है। किन्तु आप यह नहीं कह सकते कि जातिप्रथा की समस्या से संबंधित किसी भाषण में मुझे इस बात की छूट नहीं है कि मैं इस मुद्दे पर विचार करूँ की जातिप्रथा को कैसे नष्ट किया जा सकता है।
आपकी अन्य शिकायत भाषण की लंबाई को लेकर है। मैंने स्वयं भाषण में ही इस आरोप के दोष को स्वीकार किया है। किन्तु इसके लिए वास्तविक जिम्मेवार कौन है? …
राजगृह, दादर
बंबई-14
15 मई 1936
आपका,
डा० भीमराव अम्बेडकर
बा ने कहा है!
"डायबिटीज वाले व्यक्ति अपने नाभि में तुलसी का तेल लगाए इससे उनकी शुगर लेवल नियंत्रित रहती है आजमाया हुआ नुस्खा एक बार जरूर TRY करें।"

