महान शहीद बिरसा मुडा
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Nayak1News | विशेष ऐतिहासिक लेख
महान शहीद बिरसा मुडा
आदिवासी-भारत के वर्तमान आदिवासी एक ही रुप, रंग और कद के होते हुये भी विभिन्न दलों में बंटे हैं और अलग-अलग नामों से जाने जाते हैं। परन्तु इनके बंटवारे और अलग नाम पड़ने का इतिहास में कोई विश्वसनीय प्रमाण नहीं मिलता। श्री तोपनो सेम ने "कुर्सीनामा" नाम से मुंडाओं का नृजाति इतिहास लिखा है, जिसे भारत सरकार के भारतीय मानव विज्ञान सर्वेक्षण विभाग ने प्रकाशित कराया है। उसमें बताया है कि भाषा की भिन्नता को छोड़ कर मुंडा और द्रविड़ एक ही मूल के हैं। तमिलनाडु के क्रांन्तिकारी महापुरुष पेरियर ई० वी० रामास्वामी नायकर के अनुसार भारत के मूलनिवासी (वर्तमान अछूत, आदिवासी, पिछड़े और इनमें से धर्म परिवर्तित मुसलमान, सिख, ईसाई) प्राचीन काल में नाग द्रविड़ कहलाते थे और भारत के शासक प्रशासक थे। अतः समाज में ईमानदारी, खुशहाली और शांति थी। विदेशी आर्यों ने भारत में घुसकर यहाँ अधिकार जमाने की चेष्टा की तो हमारे पूर्वजों ने उन्हें रोकने के लिये युद्ध किये, जिनकी बिभीषिका का वर्णन ऋग्वेद में है। ये युद्ध न केवल दो राष्ट्रों के बीच थे, बल्कि दो सभ्यताओं के बीच हुये। इन आर्य हिन्दुओं के तथाकथित भगवानों और ऋषियों ने हमारे पूर्वजों को कितनी निर्दयता से मारा, उसका चित्रण हिन्दू मंदिरों की दीवारों पर है।
छलकपट से मूलनिवासियों को पराभूत कर उन्हें शूद्र (गुलाम) घोषित कर शिक्षा, सम्पत्ति और शस्त्र धारण करने के अधिकारों से बंचित कर दिया तो एक खून के भाई निम्नलिखित भागों में विभाजित हो गये-
(अ) जो लोग आर्यों की गुलामी से बचने के लिये जंगलों और पहाड़ों में जाकर बस गये। वे आदिवासी अथवा शिड्यूल्ड ट्राइव कहलाते हैं और कोल, भील, संथाल, असुर, मीना, कोली, पहाड़िया, मराठा, गौड़, उराव, सबर आदि नामों से जाने जाते हैं। इन्होंने अपनी प्राचीन संस्कृति और सभ्यता को सुरक्षित रखा है।
(ब) जो मूलनिवासी विदेशी आर्य आक्रमणकारियों के विरुद्ध अपनी मातृभूमि की रक्षा करते हुये मारे गये अथवा बंदी बनाकर आर्यों द्वारा अपने सेवा कार्यों में लगा लिये, उनमें दो दल बनाये- (1) शूद्र और (2) अतिशूद्र। इन दोनो दलों में ऊँच-नीच पैदा की और आपस में संघर्ष करवा कर कमजोर बनाया। फिर बदले की भावना से एक दल को जीवन-यापन के साधनों से बंचित कर मरे पशुओं का मांस खाने और गंदे पेशे करने पर मजबूर किया। कुछ समय तक शूद्र (पिछडे) और अतिशूद्र (अछूत) अशिक्षित और अधिकार विहीन रहने के कारण मूर्ख और दीनहीन बन गये तो काल्पनिक ग्रन्थ लिख कर अपने आपको भूदेव श्रेष्ठ घोषित कर दिया और शूद्र अतिशूद्रों को नीच गुलाम अछूत घोषित कर दिया। वेद, शास्त्र, पुराण, स्मृतियां आर्य ब्राह्मणों ने स्वयं लिखीं पर भविष्य में उन पर कोई उंगली न उठाये इसलिये उन्हें अपन पुराने ऋषियों अथवा ईश्वर द्वारा रचित बता कर तथाकथित ईश्वर भगवान को जगह का रचियता, रक्षक, पालनहार कह कर इसे पवित्रतम घोषित करते रहे और उसके नाम पर से विदेशी मूल के आर्य ब्राह्मण सर्वाधिक अनैतिक और अमानवीय कार्य करते रहे। को निन्दनीय हिन्दू धर्म ग्रन्थ आर्य ब्राह्मणों के दूषित मस्तिष्क की उपज हैं, जिन्हें है ईश्वर के संदेश के रुप में प्रचारित करते रहे हैं। उनके ऊपर संदेह करना अक्षभ्य अपराध ठहराया। फिर पेशों के नाम पर इन मूलनिवासियों को धीरे-धीरे हजारों जातिरुपी टुकड़ों में बांट, उनमें आपस में ऊँच नीच और विचार भिन्नता व ईर्ष्या उत्पन्न करा कर उन्हें आपस में लड़वाते रहे और दुधारु गाय की तरह इतना अशक्त बनाये रखा कि उनमें बुद्धि, साहस और स्वाभिमान समाप्त हो गया।
राष्ट्रपिता जोतीराव फुले ने शूद्रों और अतिशूद्रों को एक ही खून के बन्धु-बांधव और मूल निवासी क्षत्रिय बताया और अपनी पुस्तक 'गुलामगिरी' में लिखा कि जिन मूलनिवासी क्षत्रियों ने विदेशी मूल के आर्य ब्राह्मणों के साथ संघर्ष किया, उनका अलग वर्ग बनाकर पूर्ण रुप से बदला चुकाने की नियति से उनकी भावी संतानों को अछूत बना दिया। यही नहीं, बल्कि शूद्र बनाये गये माली, सेनी, यादव, कुर्मी, नाई, कुम्हार आदि के दिलों में यह बात बिठाई कि उन्हें स्पर्श न करें। अतः उन्हें गंदे पेशे करते और पशुओं का मांस खाते देख शूद्र वर्ग के लोग जो उन्हीं के बन्धु बांधव थे. बडे अंहकार से अपने को सैनी, कुर्मी, यादव, लुहार, बड़ई, कुम्हार, स्वर्णकार आदि कहकर उनसे पृथक हो गये। यद्यपि वे शूद्र ही कहे जाते रहे, किन्तु अलग-अलग उद्यमों के नाम पर अलग अलग जातियों, वर्गों में बंट गये और अपने भाई अछूतों से घृणा करने लगे। आर्य ब्राह्मणों की कूटनीति उनकी समझ में नहीं आई। मूल निवासियों की इस हीन सामाजिक स्थिति को बदलने के लिये और उनका उत्थान करने के लिये जोतीराव फुले इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि शूद्र/अतिशूद्र समाज में बुद्धि. साहस और स्वाभिमान का निर्माण करने के लिये इन्हें शिक्षित करना आवश्यक है। अतः उन्होंने शूद्र अतिशूद्र (अछूत) बालक बालिकाओं के लिये बहुत से स्कूल खोले। डा० बाबा साहव अम्बेडकर ने अपनी पुस्तक अछूत कौन और कैसे में भी नाग, द्रविड़, असुर कहे जाने वालों को भारत के मूल निवासी और एक ही नस्ल और खून के भारत के मूल क्षत्रिय बताया है।
जो मूलनिवासी अछूत, आदिवासी पिछड़ों में से मुस्लिमकाल में मुस्लिम और सिख और ब्रिटिश काल में ईसाई बन गये, वे अल्पसंख्यक कहलाते हैं। इस प्रकार भारत के मूल निवासी आज चार वर्गों में विभाजित है-(1) आदिवासी (2) अछूत (3) पिछडे और (4) अल्पसंख्यक ।
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बा ने कहा है!
"पैरों में झनझनाहट रहती है?
रात में अरंडी का तेल हल्का गर्म कर मालिश करो। नसों को आराम मिलता है और झनझनाहट घटती है।" "
बा ने कहा है!
"पैरों में झनझनाहट रहती है? रात में अरंडी का तेल हल्का गर्म कर मालिश करो। नसों को आराम मिलता है और झनझनाहट घटती है।" "

