📍 विशेष रिपोर्ट | Nayak1News
सीता और द्रौपदी मूलनिवासी महिलाएं थीं। इन ग्रंथों में स्त्रियों को सामाजिक नियंत्रण के माध्यम के रूप में उपयोग किया गया।
— मा. वामन मेश्राम (राष्ट्रीय अध्यक्ष, बामसेफ)
डीएनए आधारित मेडिकल और बायोलॉजिकल शोध आज पूरी दुनिया में मान्य हैं। इन्हीं वैज्ञानिक आधारों पर यह स्पष्ट होता है कि मातृप्रधान व्यवस्था को समाप्त कर पितृप्रधान व्यवस्था थोपी गई।
मातृप्रधान व्यवस्था का विनाश
महिलाएं केवल परिवार नहीं बल्कि राष्ट्र का नेतृत्व करती थीं। इसी कारण ब्राह्मणवादी व्यवस्था ने महिलाओं को नियंत्रण का केंद्र बनाया।
जाति व्यवस्था और स्त्री का उपयोग
सती प्रथा, बाल विवाह, विधवा विवाह निषेध और कन्यादान महिलाओं को आधार बनाकर गढ़ी गई व्यवस्थाएं हैं।
रामायण–महाभारत और मूलनिवासी महिलाएं
सीता और द्रौपदी मूलनिवासी महिलाएं थीं। इन ग्रंथों में स्त्रियों को सामाजिक नियंत्रण के माध्यम के रूप में उपयोग किया गया।
महिलाएं पुरुषों की नहीं, व्यवस्था की गुलाम
पुरुषों को ब्राह्मणवादी व्यवस्था का वाहक बनाकर अपने ही परिवारों में गुलामी लागू करवाई गई।
संघर्ष का रास्ता
महिला मुक्ति के लिए पुरुषों से नहीं, ब्राह्मणवादी व्यवस्था से संघर्ष आवश्यक है। संघर्ष के तीन चरण हैं – बौद्धिक, संगठित और जन आंदोलन।
महिलाओं को केवल रसोई नहीं, सामाजिक और राष्ट्रीय कार्यों में निर्णायक भूमिका देनी होगी।
सीता और द्रौपदी मूलनिवासी महिलाएं थीं। इन ग्रंथों में स्त्रियों को सामाजिक नियंत्रण के माध्यम के रूप में उपयोग किया गया।
