पुणे / nayak1news
सावित्रीबाई का जिस दिन जन्म हुआ, वह दिन हम सभी बहुजन मूलनिवासी लोगों के लिए जीवन अर्पण करने वाला समय था, ऐसा प्रतिपादन बहुजन मुक्ति पार्टी की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष निशा मेश्राम ने किया। वे पुणे स्थित बामसेफ भवन के डी.के. खापर्डे हॉल में आयोजित क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फुले की 195वीं जयंती कार्यक्रम में बोल रही थीं।
निशा मेश्राम ने आगे कहा कि आज के ही दिन एक महिला का जन्म हुआ। उस समय एक महिला होना ही युद्ध के समान था। कोई भी महिला केवल जन्म ही नहीं लेती, बल्कि जब वह गर्भधारण करती है, उससे पहले ही वह यह सोचती है कि यदि मैं मां बनी तो कहीं मुझे बेटी तो नहीं होगी? इसी सोच से उस महिला का संघर्ष शुरू हो जाता है। इसलिए माता सावित्रीबाई का जन्म जिस दिन हुआ, वह दिन हमारे सभी लोगों के लिए जीवन अर्पण करने वाला समय था।
3 जनवरी 1831 को सातारा जिले के नायगांव में माता सावित्रीबाई का जन्म हुआ। और बाल्यावस्था में ही उनका विवाह हुआ। ज्योतिराव फुले के साथ सावित्रीबाई का विवाह हुआ और ज्योतिराव फुले अपने ब्राह्मण मित्र के विवाह में गए। जब एक युवा शूद्र ब्राह्मण मित्र के विवाह में जाता है और बारात के आगे चलता है, यह देखकर ब्राह्मणों को आश्चर्य हुआ कि यह एक व्यक्ति ब्राह्मणों की बारात के आगे कैसे चल रहा है वह कौन है? यह तेजस्वी युवक कौन है? ऐसा उन्होंने पूछा।
इसके बाद बारात में मौजूद ब्राह्मणों के बीच फुसफुसाहट शुरू हो गई। ब्राह्मणों ने कहा कि यह युवक तो सातारा जिले के गोविंदराव माली का बेटा है। यह शूद्र का बेटा है। ब्राह्मणों की बारात में शूद्र का क्या काम। यह सुनते ही ब्राह्मणों में खलबली मच गई और ब्राह्मणों ने ज्योतिराव फुले को धक्के मारकर बारात से बाहर फेंक दिया। यह घटना हमारे इतिहास की एक बड़ी परिवर्तनकारी घटना थी।
ब्राह्मणों ने केवल ज्योतिराव फुले को ही धक्के मारकर बारात से बाहर नहीं निकाला था, बल्कि उन्होंने स्वयं को एक चुनौती दी थी कि एक दिन उन्हें भी इस देश से बाहर जाना पड़ेगा।
बारात से बाहर निकाले जाने के बाद ज्योतिराव फुले घर आए और अपने पिता से पूछने लगे कि ब्राह्मणों ने मुझे बारात से धक्के मारकर बाहर क्यों निकाला? उस समय ज्योतिराव फुले के पिता गोविंदराव माली भी ब्राह्मणवादी व्यवस्था के गुलाम थे। उन्हें भी विचारधारा की कोई जानकारी नहीं थी। गोविंदराव माली ने ज्योतिराव फुले से कहा कि बेटा, तुम ब्राह्मणों की बारात में क्यों गए थे? नहीं जाना चाहिए था। ऐसी स्मृति निशा मेश्राम ने कराई।
उन्होंने कहा कि इसके बाद ज्योतिराव फुले को इतना मानसिक आघात लगा कि उन्होंने स्वयं को तीन दिनों तक घर में बंद कर लिया। इसके बाद उन्होंने इस विषय पर विचार-मंथन किया कि आखिर उन्होंने मुझे बारात से धक्के मारकर बाहर क्यों निकाला??
तीन दिन के विचार-मंथन के बाद ज्योतिराव फुले को समझ आया कि इस देश की में वर्ण व्यवस्था,जात-पात, ऊंच-नीच, महिलाओं की गुलामी की व्यवस्था के कारण मुझे बारात से बाहर निकाला गया।अब मुझे क्या करना होगा?इस असमान ब्राह्मणी व्यवस्था को मैं कैसे बदल सकता हूं? क्या मैं अकेला इस व्यवस्था को बदल सकता हूं? नहीं? मैं अकेला इस व्यवस्था को नहीं बदल सकता। इसके बाद जब ज्योतिराव फुले ने कमरे का दरवाजा खोला तो सामने सावित्रीबाई फुले खड़ी थीं। उन्होंने सावित्रीबाई से कहा कि इस असमान ब्राह्मणी व्यवस्था को बदलने के लिए क्या तुम मेरी मदद करोगी?
जीवन भर सावित्रीबाई ने ज्योतिराव फुले के कदम से कदम मिलाकर काम किया। ज्योतिराव फुले के साथ काम करते समय सावित्रीबाई को बड़ा संघर्ष करना पड़ा।
गोविंदराव फुले ने कहा कि सावित्री संतान को जन्म नहीं दे सकती, वह वंश को आगे नहीं बढ़ा सकती, ज्योति तुम दूसरा विवाह कर लो। तब सावित्रीबाई ने ज्योतिराव फुले से कहा कि यदि आपको अपना वंश बढ़ाना है तो आप दूसरा विवाह कर लीजिए। लेकिन ज्योतिराव फुले ने इससे इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि सावित्री मेरा एक प्रस्ताव है मेरी गर शादी करवानी है तो उसी मंडप में तुम्हारी भी शादी होगी, तुम भी दूसरा विवाह कर लो। इस पर सावित्रीबाई ने कहा कि नहीं, मैं ऐसा नहीं करूंगी, क्योंकि मैंने आपको ही अपना पति माना है। इस पर ज्योतिराव ने कहा कि यदि ऐसा है तो मेरे जीवन में भी दूसरी कोई सावित्री नहीं हो सकती।
जब ज्योतिराव फुले और सावित्रीबाई मांग-महार वाड़े में जा रहे थे, तब उन पर कीचड़ फेंका जाता था। ब्राह्मणों के सामने महिलाओं को रोकना एक बड़ा संकट था। इसलिए क्या किया जाना चाहिए? ऐसा प्रश्न उनके मन में उत्पन्न हुआ। इसके बाद ब्राह्मणों ने माता सावित्रीबाई के चरित्र हनन का प्रयास करने का प्लान बनाया। वहां एक गुंडा भेजा गया और सावित्रीबाई फुले को डराने की कोशिश की गई. इसके बाद सावित्रीबाई फुले ने उस गुंडे को जोरदार थप्पड़ मारा। यह थप्पड़ ब्राह्मणवाद पर एक करारी चोट थी।
उन्होंने महिलाओं के लिए स्कूल खोले, उनका साथ सहयोग उस्मान शेख और फातिमा शेख ने दिया। आज भारत की महिलाओं को जो पढ़ने-लिखने का मौका मिला है, वह सावित्रीबाई फुले का ही अहसान है।
आज भी घिसिपिटी व्यवस्था कई चली आ रही है. मुझे भी सरकारी नौकरी करने का अधिकार उन्हीं के संघर्षो के कारण मिला. जब मैं फील्ड वर्क के लिए टीबी के पेशेंट को दवा मिली के नहीं? ट्रीटमेंट शुरू हुआ के नही ?दवा ले रहा/रही के नहीं ? देखने को जाती तो नाम जो हमे लिखाया होता था ऊषा. हम खोजते उषा को लेकिन वह हमे नहीं मिलती क्योंकि उसका सही नाम उषा होता है शादी के बाद उस लड़की का नाम निशा हो जाता है। उषा को तो कोई पहचानता ही नहीं.यह सड़ी हुई व्यवस्था शादी के बाद लड़की का नाम बदल देना यह भी बंद होना चाहिए.
जब मैं पहली बार अमेरिका गई तब वॉशिंगटन में मुझे भी बोलने का मौका मिला.हमारे महापुरुषों के संघर्ष के कारण हम यहां तक पहुंचे तक मुझे याद आया के पुणे का एक ब्राह्मण चिपणुणकर के ज्योतिबा फुले को कहा था के तुम जो सत्योधक समाज का निर्माण किया है उसकी विचारधार यहां पुणे के स्वारगेट से बाहर नहीं जाएंगी.तब मैने उस चिपणुणकर ब्राह्मणों के वंशजोो कहा जो ज्योतिबा फुले की विचारधार तुम कहते थे पुणे के स्वारगेट से बाहर नहीं जाएंगी तो वो विचारधारा की आग मैंने अमेरिका तक पहुंचाई है.
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